Dalit Vote Politics in Bihar-? “बिहार में दलित वोट का असली ठेकेदार कौन? चिराग पासवान या जीतनराम मांझी? आंकड़े चौंकाते हैं!”

Dalit Vote Politics in Bihar-?


? बिहार में दलित वोटों की सियासत: क्या चिराग और मांझी ही हैं असली दावेदार? आंकड़े बताते हैं कुछ और!

Dalit Vote Politics in Bihar-?  बिहार की राजनीति में दलित वोट हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता आया है। अब जब विधानसभा चुनाव 2025 की आहट सुनाई देने लगी है, सियासत के इस मैदान में चिराग पासवान और जीतनराम मांझी एक बार फिर आमने-सामने हैं।
Dalit Vote Politics in Bihar-?  लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई ये दोनों नेता दलित मतदाताओं के सबसे बड़े प्रतिनिधि हैं? या फिर यह सिर्फ राजनीतिक भ्रम है?


? बिहार में दलितों की जनसंख्या और राजनीतिक हैसियत

बिहार की कुल आबादी में दलितों की भागीदारी 19.65% है, यानी लगभग हर पांचवां मतदाता दलित वर्ग से आता है
243 विधानसभा सीटों में से 38 सीटें SC वर्ग के लिए आरक्षित हैं, और दो सीटें ST के लिए। यानी कुल 40 सीटें दलित-आदिवासी आरक्षित हैं।

ऐसे में यह वर्ग चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। यही वजह है कि चाहे एनडीए हो या महागठबंधन – सभी की नजर इस वोट बैंक पर है।


? चिराग पासवान और मांझी की पकड़ कितनी मजबूत?

✅ चिराग पासवान (एलजेपीआर)

  • 2020 में पार्टी को मिला वोट शेयर: 5.8%

  • जीती गई सीटें: 1 (वो भी गठबंधन से अलग लड़ने पर)

  • आरक्षित सीटों पर प्रदर्शन: एक भी जीत नहीं मिली

  • चिराग का वोट बेस मुख्यतः पासवान समुदाय तक सीमित है

✅ जीतनराम मांझी (हम सेक्यूलर)

  • 2020 में वोट शेयर: 1% से भी कम

  • जीती गई सीटें: 4 (3 आरक्षित सीटें)

  • मांझी का प्रभाव मगध और दक्षिण बिहार के कुछ क्षेत्रों तक सीमित

  • मांझी खुद दो सीटों से लड़े और एक पर हार गए थे (2015 में)


? 2020 के आंकड़े क्या कहते हैं?

दल का नाम वोट प्रतिशत कुल सीटें आरक्षित सीटें
BJP 19.5% 74 11
JDU 15.4% 43 8
LJP (चिराग) 5.8% 1 0
HAM (मांझी) ~1% 4 3
VIP (मुकेश सहनी) ~1% 4 1

निष्कर्ष: एनडीए को आरक्षित 40 सीटों में से 23 पर सफलता मिली थी, जिसमें मुख्य भूमिका BJP और JDU की रही।
चिराग पासवान की पार्टी का प्रदर्शन आरक्षित सीटों पर पूरी तरह विफल रहा।


? 2015 में क्या हुआ था?

2015 के विधानसभा चुनावों में एलजेपी और हम (मांझी) दोनों एनडीए के साथ थे।
फिर भी एनडीए केवल 16 आरक्षित सीटें ही जीत सका था।

  • मांझी की पार्टी को केवल 1 सीट मिली

  • एलजेपी को आरक्षित क्षेत्र में कोई खास सफलता नहीं मिली

  • आरजेडी और कांग्रेस ने कुल 24 सुरक्षित सीटें जीतीं


? दलित राजनीति में अन्य दावेदार

✅ राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (पशुपति पारस)

  • रामविलास पासवान के निधन के बाद परिवार में फूट के बाद बनी पार्टी

  • दलित समुदाय में पहचान तो है, लेकिन असर कमजोर

✅ कांग्रेस

  • 2010 में 18 आरक्षित सीटें जीतकर सबसे बड़ी दलित प्रतिनिधि पार्टी बनी थी

  • 2025 में राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित वोट बैंक साधने की कोशिश

✅ आरजेडी

  • हाल में लालू यादव के जन्मदिन पर दलित बस्तियों में भोज और केक काटने जैसे कार्यक्रम

  • दलितों को सामाजिक न्याय का पुराना संदेश देने की रणनीति


? एनडीए और महागठबंधन में अंदरूनी संघर्ष

चुनाव से पहले एनडीए के अंदर ही लड़ाई शुरू हो गई है।

  • जीतनराम मांझी ने चिराग पासवान पर हमला बोला

  • एलजेपीआर ने मांझी को “दलित हितों का सौदागर” कहा

यह जुबानी जंग बताती है कि दलित वोटों को लेकर एनडीए अंदर से ही अस्थिर है।


? जमीनी हकीकत: दलित वोट कहां जाएगा?

आंकड़ों की बात करें तो चिराग और मांझी की पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों में सीमित प्रभाव रखती हैं।
लेकिन दलित वोट बैंक अब जागरूक हो चुका है।
वे अब सिर्फ जाति नहीं, विकास, सम्मान और सुरक्षा को देखकर वोट देते हैं।


?️ 2025 के चुनाव में क्या होगा?

  • क्या कांग्रेस और आरजेडी की दलितों में पैठ बन पाएगी?

  • क्या चिराग या मांझी कोई बड़ा सियासी चमत्कार कर पाएंगे?

  • क्या बीजेपी फिर से दलित सीटों पर मजबूती से उतरेगी?

ये सवाल आने वाले चुनावों की दिशा तय करेंगे।


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? निष्कर्ष:

Dalit Vote Politics in Bihar-?  चिराग पासवान और जीतनराम मांझी खुद को दलित राजनीति का चेहरा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
लेकिन चुनावी आंकड़े बताते हैं कि बिहार में दलित वोट बैंक बंटा हुआ है, और कोई एक पार्टी या नेता इसका ठेकेदार नहीं है।
दलित मतदाता अब परिपक्व हो चुके हैं, और वे केवल वादों के नहीं, काम के आधार पर वोट देने को तैयार हैं।


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