Chhattisgarh loksabha Election Review : छत्तीसगढ़ में क्या‌ रही कांग्रेस की करारी हार की वजह; कहां फेल हो गया दिग्गजों का गणित…

Chhattisgarh loksabha Election Review:

 

Chhattisgarh loksabha Election Review : Google Hindi News : रायपुर | [छत्तीसगढ़ बुलेटिन] | ऑनलाइन बुलेटिन : लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर छत्तीसगढ़ का परिणाम अब साफ हो गया है। छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस पार्टी 10 लोकसभा सीटों में बुरी तरह हार गई। वहीं छत्तीसगढ़ के अजातशत्रु कहे जाने वाले डॉ चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत ने कोरबा लोकसभा से 1 सीट पर विजयी पताका फहराया है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित दिग्गज नेता भी इस लोकसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाए। कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अप्रत्याशित रूप से सत्ता में वापसी की लेकिन छत्तीसगढ़ में पांच साल सत्ता के बाद भी लोकसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई। (Chhattisgarh loksabha Election Review)

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जानकारों की माने तो कांग्रेस के स्थानीय वरिष्ठ नेताओं का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गांधी के द्वारा संविधान, आरक्षण, गरीबों, महिलाओं व जाति जनगणना जैसी महत्वपूर्ण घोषणाओं से दूरी बनाए रखा। जो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के नेताओं की हार का बड़ा कारण बना। आइए इन 10 बिन्दुओं पर जानते हैं कि छत्तीसगढ़ लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेताओं की हार के मुख्य कारण क्या थे।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

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खड़गे व राहुल के वक्तव्यों का नहीं दोहराना

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं ने लोकसभा चुनाव के दौरान धुंआधार प्रचार प्रसार किया। लेकिन उन्होंने जमीनी प्रचार प्रसार से दूरी बनाए रखी। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं व पार्टी की घोषणाओं का छत्तीसगढ़ के नेताओं ने ठीक ढंग से प्रचार नहीं किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गांधी ने संविधान, आरक्षण, गरीबों, महिलाओं व जाति जनगणना की बात कही है। लेकिन छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के नेताओं ने पार्टी के इन बयानों व घोषणाओं से दूरी बनाए रखी। जबकि कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनाव परिणाम के बाद प्रेस कांफेंस में कहा कि “दिल से धन्यवाद करना चाहता हुं। आपने संविधान को बचाने का पहला और सबसे बड़ा कदम ले लिया है।” (Chhattisgarh loksabha Election Review)

संविधान और आरक्षण की बात ना करना

चुनावी मंचों से कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संविधान और आरक्षण को लेकर कोई वक्तव्य अथवा बयान नहीं दिया गया। इससे अनुसूचित वर्ग के मतदाताओं में पार्टी नेताओं के खिलाफ मैसेज गया। जबकि राष्ट्रीय नेताओं द्वारा संविधान और आरक्षण बचाने को लेकर खुले तौर पर बयान दिए जा रहे थे। लेकिन छत्तीसगढ़ के दिग्गज नेताओं ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया जिसके कारण अनुसूचित वर्ग के वोटरों का स्थानीय नेताओं पर से भरोसा उठ गया और नेताओं के खिलाफ में वोटिंग किए। (Chhattisgarh loksabha Election Review)

महिला वोटरों तक नहीं पहुंच पाना

पार्टी के नेताओं द्वारा प्रचार के दौरान महिला वोटरों से दूरी बनाकर रखना भी हार का कारण बना। नेता व कार्यकर्ता पार्टी की योजनाओं की जानकारी देने महिलाओं तक पहुंचने में तेजी नहीं दिखाई। प्रचार कैंपेन सोशल मीडिया या पोस्टर अभियान तक ही सीमित रहा। घर-घर मतदाता पर्ची नहीं पहुंचाए जाने से पार्टी कार्यकर्ता महिला वोटरों से सीधे नहीं जुड़ पाए और खिलाफ में मतदान हुआ।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

 

पार्टी की घोषणाओं का प्रचार ठीक से नहीं करना

कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव को लेकर अनेक घोषणाएं की थी। उन घोषणाओं को लेकर वरिष्ठ नेता मतदाताओं तक नहीं पहुंचे। वे लगभग सभी मंचों पर अपनी बात करते रहे। अपने पांच साल के कार्यकाल को दोहराते और अपनी ही पीठ थपथपाते रहे। जबकि होना यह था कि कांग्रेस पार्टी की घोषणाओं को वरिष्ठ नेता सभी मंचों से दुहराते और बताते कि उनके (कांग्रेस) शीर्ष नेतृत्व ने आपके (मतदाताओं) लिए यह घोषणाएं की है। (Chhattisgarh loksabha Election Review)

 

एससी-एसटी, ओबीसी को विश्वास में नहीं लेना

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार के प्रमुख कारणों में से एक कारण एससी-एसटी, ओबीसी को विश्वास में नहीं ले पाना भी है। अनुसूचित वर्ग का मतदाता जिसका ज्यादातर वोट प्रतिश दूसरी पार्टीयों में बंट गया था। लेकिन इस चुनाव में आरक्षण और संविधान का मुद्दा उठ जाने से अनुसूचित वर्ग के मतदाता कांग्रेस की ओर देख रहा था। लेकिन पार्टी नेताओं ने एससी-एसटी, ओबीसी के मतदाताओं को विश्वास नहीं दिला पाए। उन्हें अपनी ओर से आश्वस्त नहीं किए जाने और सभी राजनीतिक मंचों से आरक्षण व संविधान के लिए नहीं बोले जाने के कारण कांग्रेस का वोट कांग्रेस के ही नेताओं को नहीं मिला और व दूसरी पार्टीयों में बंट गया।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

कांग्रेस नहीं वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ में वोटिंग

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार का एक बहुत बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस का वोट कांगेस के नेताओं को ही नहीं मिला। यह उनके अत्यधिक आत्मविश्वास का नतीजा था। नेताओं ने मंचों से भाषण तो खूब दिए लेकिन कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक को भविष्य के लिए आश्वस्त नहीं कर पाए। इससे कांग्रेस का परंपरागत वोटर्स वरिष्ठ नेताओं से नाराज हो गया और इन वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ में कांग्रेस के परंपरागत वोटर्स ने मतदान किया। (Chhattisgarh loksabha Election Review)

सुरक्षित सीट से डॉ. शिव डहिरया की हार

अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली छत्तीसगढ़ की एकमात्र सीट जांजगीर-चांपा पर प्रदेश भर की नजर थी। यहां से अनुसूचित जाति समाज का खुद को बड़ा चेहरा बताने वाले डॉ. शिव डहरिया ने चुनाव लड़ा। पूरे प्रदेश की नजर इस सीट पर थी। इस सुरक्षित सीट से डॉ. शिव डहरिया का चुनाव हारना बड़े सवाल खड़े करता है।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

सरकार और समाज के बीच बने दीवार

छत्तीसगढ़ में तीन बार के विधायक डॉ शिवकुमार डहरिया का राजनीतिक करियर करीब चार दशक का है। छात्र संघ से राजनीति की शुरुआत करने वाले डॉ. डहरिया तीन बार विधायक और एक बार मंत्री रह चुके हैं। इसके अलावा विधानसभा की कई समितयों में भी रहे हैं। बावजूद इसके उन पर आरोप लगते रहे हैं कि सरकार और समाज के बीच दीवार बनकर खड़े रहे। डॉ. डहरिया ने कभी अनुसूचित जाति समाज की बात सरकार के सामने नहीं रखी। इन सबका असर 2024 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

आरक्षण के मुद्दे पर मुखर नहीं होना

डॉ. शिव डहरिया ने अनुसूचित जाति समाज के आरक्षण को लेकर कभी कोई बात कैबिनेट में नहीं रखा। वर्ष 2012 में भाजपा के नेतृत्व वाली डॉ रमन सिंह सरकार ने अनुसूचित जाति का आरक्षण 16 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत कर दिया। इस समय भी पूरा छत्तीसगढ़ का अनुसूचित जाति समाज शिव डहरिया की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। वहीं पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर भी वे मुखर नहीं हुए। न ही सरकार में बात रखी, न कैबिनेट में कभी प्रस्ताव लाया। अनुसूचित जाति का पूरी तरह से अनदेखी किए जाने का असर समाज में गहरा हुआ और कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ में वोटिंग कर अपना गुस्सा जाहिर किया।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

दूसरे लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना

इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों का अपनी लोकसभा छोड़कर दूसरे क्षेत्रों से चुनाव लड़ना भारी पड़ा। पूर्व सीएम भूपेश बघेल दुर्ग लोकसभा छोड़कर राजनांदगांव लोकसभा से चुनाव लड़े और हार के करीब पहुंच गए। दुर्ग जिले से ताल्लुक रखने वाले पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू महासमुंद लोकसभा से चुनाव लड़े और करारी हार का सामना करना पड़ा। रायपुर और महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले पूर्व मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया जांजगीर-चांपा लोकसभा से चुनाव लड़े और हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह दुर्ग भिलाई से ताल्लुक रखने वाले देवेंद्र यादव को बिलासपुर लोकसभा से प्रत्याशी बनाया गया। यहां भी बाहरी का मुद्दा खूब गरमाया और इन्हें भी हार का सामना करना पड़ा।(Chhattisgarh loksabha Election Review)

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