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CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने संविधान को बताया नारी उत्थान का दस्तावेज, बोले- जो समाज के हाशिए पर हैं, उनको भी देता है वोट का अधिकार, पश्चिमी देशों से भी दी है ज्यादा ताकत | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

नई दिल्ली | [नेशनल बुलेटिन] | डॉ. अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान नारी उत्थान का दस्तावेज है। यह महिलाओं, गरीबों के साथ समाज के उस वर्ग को भी वोट का अधिकार देता है जो समाज के हाशिए पर हैं। यह बातें भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहीं। उन्होंने कहा कि यह संविधान ही है, जिसने  इस वर्ग को पश्चिमी देशों से ज्यादा ताकत दी है।

 

सीजेआई ने कहा कि यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी (यूएएफ) की शुरुआत एक वक्त में बेहद क्रांतिकारी काम था।

 

संविधान का सबसे साहसिक कदम

 

जस्टिस चंद्रचूड़ शुक्रवार को आठवें डॉ. एलएम सिंघवी मेमोरियल लेक्चर के दौरान बोल रहे थे। इस लेक्चर का विषय था ‘यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइज़ी: ट्रांसलेटिंग इंडियाज पॉलिटिकल ट्रांसफॉर्मेशन इन ए सोशल ट्रांसफॉर्मेशन’।

 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह औपनिवेशिक और पूर्व-औपनिवेशिक विरासत से अलग है और संविधान द्वारा अपनाया गया सबसे साहसिक कदम है। सीजेआई ने कहा कि पूर्व समय में सत्ता केवल कुछ ही लोगों के हाथ में हुआ करती थी।

 

शुरुआती दौर में जिन्हें अधिकारों और ताकतों से वंचित रखा गया, अब वही लोग संसदीय संरचना के चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं। सीजेआई ने इस सामाजिक बदलाव के लिए यूएएफ की भूमिका की तारीफ की।

 

डॉ. बीआर आंबेडकर को किया याद

 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि संविधान निर्माताओं को पता था कि राजनीतिक समानता सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए काफी नहीं होगी। ऐसे में वोट देने के अधिकार ने सभी नागरिकों के बीच एक जिम्मेदारी का भाव पैदा किया।

 

इसके साथ ही देशवासियों में अपनेपन की भी भावना पैदा हुई। इस दौरान उन्होंने डॉक्टर बीआर आंबेडकर को भी याद किया। डॉ. आंबेडकर को कोट करते हुए सीजेआई ने कहा कि आम वयस्क मताधिकार के ख्याल से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

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उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी को उन लोगों के नजरिए से देखी जानी चाहिए, जिन्हें पहले वोट करने का अधिकार नहीं है। बाद में संविधान द्वारा वोट देने की अनुमति मिली। यूएएफ ने दलितों के लिए भी खास रोल प्ले किया है।

 

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