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धम्मपदं: हमारा जितना नुकसान बाहरी दुश्मन करता है, उससे काफी बड़ा नुकसान गलत दिशा पर लगा हुआ हमारा मन करता है | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

दिसो दिसं यं तं कयिरा, वेरी वा पनवेरिनं।

मिच्छापणिहितं चित्तं, पापियो नं ततो करे।।

जितना बुरा, हानि, अहित द्वेषी द्वेषी का, शत्रु शत्रु का और वैरी वैरी का करता है उससे कहीं अधिक हानि, अहित गलत दिशा, झूठे मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है।

 

संसार में लोग अपने बाहरी दुश्मन से बहुत घबराते हैं, सचेत रहते हैं कि वह कोई छोटा बड़ा नुकसान न कर दे। लेकिन सबसे खतरनाक दुश्मन तो मैल से सना हुआ मनुष्य का मन है, जो भौतिक, शारीरिक, मानसिक हर तरह का भारी अहित, बुरा करता है। उल्टा लोग स्वयं के ऐसे चित्त से भी बहुत प्रेम करते है जो उन्हें गलत मार्ग पर पटकता है अहित कराता है दुख में डालता है।

 

बाहरी शत्रु तो सिर्फ भौतिक नुकसान ही कर सकता है और उसकी पूर्ति भी हो सकती है लेकिन बड़ी हानि तो मन की शांति की है व्यक्ति के सच्चे सुख खो जाता है।

 

     मिथ्या, गलत मार्ग क्या है? गलत दिशा क्या है ?…

 

जब व्यक्ति स्वयं को न देखकर बाहर भटकता है, अंतर्मुखी की बजाय बहिर्मुखी हो जाता है। सुख की चाबी स्वयं के पास है, सुख का स्त्रोत स्वयं का चित्त है. प्रयास कर इसे देखने, जानने की जरूरत है.इस चित्त को सही दिशा में रखकर सदुपयोग करने की जरूरत है।

 

लेकिन व्यक्ति का चित्त बाहर की चकाचौंध की ओर आकर्षित होता है, उसे यह पता है कि अंतत: इनसे दुख व अशांति ही मिलेगी लेकिन उसे बाहरी दुनिया बहुत लुभाती है। कभी रूप-रंग लुभाता है तो कभी सुखद स्पर्श के पीछे पागल हो जाता है, कभी स्वाद, तो कभी मदहोश करने वाली सुगंध, तो कभी तारीफ के शब्द।

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यदि चित्त पर संयम न हो और गलत दिशा में भागता है तो वह रूप, पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, धन आदि कुछ भी दिख जाए तो उसकी ओर आकर्षित होता है, उसे पाने के लिए लालायित रहता है फिर पाने के लिए मन,वाणी और शरीर से अकुशल, बुरे कर्म करता है। इनके परिणाम में दुख, अशांति मिलते हैं तो फिर पछताने के सिवाय कुछ नहीं होता है।

 

अत: बाहरी शत्रु हमारी उतनी हानि नहीं कर सकता, जितनी गलत दिशा में लगा हुआ हमारा चित्त(मन) कर सकता है। सजग चित्त वाला साधक हमेशा स्वयं को देखता है, चित्त को सही मार्ग पर टिकाता है, उसे शुद्ध करने में लगा रहता है क्योंकि उसको मालूम है कि बाहरी शत्रु से ज्यादा अहित गलत दिशा में भटकने वाला चित्त करता है।

 

       सबका मंगल हो ….सभी प्राणी सुखी हो

 

डॉ. एम एल परिहार

©डॉ. एम एल परिहार

परिचय- जयपुर, राजस्थान.

 

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