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जब एक युवा नेता ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दी थी खुली चुनौती, सालभर में छीन ली गई थी गुजरात मुख्यमंत्री की कुर्सी | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

नई दिल्ली | [पॉलिटिकल स्टोरी] | करीब 9 महीने बाद यानी जून 1973 तक चिमनभाई पटेल के समर्थन में कांग्रेस के आधे यानी 70 विधायक आ चुके थे। फिर भी पटेल बहुमत से कोसों दूर थे। बावजूद इसके  मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी पेश करने के लिए वह बेचैन थे। उस वक्त इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। जब इंदिरा गांधी बंबई दौरे पर राजभवन में थीं, तब उनसे मिलने चिमनभाई पटेल वहां जा पहुंचे।

 

बात साल 1972 की है। गुजरात में चौथी विधानसभा के लिए चुनाव हो चुके थे। तब 168 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 140 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। घनश्याम छोटालाल ओझा ने 17 मार्च, 1972 को गुजरात के सीएम पद की शपथ ले ली थी। उनके साथ ही युवा कांग्रेस नेता चिमनभाई पटेल गुजरात के पहले उप मुख्यमंत्री बनाए गए थे। चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन उनके समर्थन में विधायक कम थे।

 

सहज नहीं रही थी मुलाकात

 

चिमनभाई पटेल और इंदिरा गांधी की मुलाकात सहज नहीं थी। पटेल ने तब इंदिरा गांधी को चुनौती देते हुए कहा था कि आप यह तय नहीं कर सकतीं कि गुजरात में विधायक दल का नेता कौन होगा। यह तो वहां के विधायक ही तय करेंगे। इंदिरा गांधी ने तब चिमनभाई पटेल का कोई विरोध नहीं किया था और उन्हें गुजरात प्रभारी से मिलने को कह दिया।

 

सात वोट से जीत गए थे पटेल

 

उस वक्त सरदार स्वर्ण सिंह गुजरात के प्रभारी थे और केंद्र सरकार में विदेश मंत्री थे। स्वर्ण सिंह ने गुजरात की इस समस्या के सामाधान के लिए तब गुप्त मतदान कराने का सुझाव दिया था। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। स्वर्ण सिंह की बात पार्टी नेतृत्व ने मान ली। सिंह खुद गुजरात गए और वहां गुप्त मतदान करवाया लेकिन उसकी गिनती दिल्ली में आकर हुई। इस गुप्त मतदान में चिमनभाई पटेल अपने प्रतिद्वंद्वी कांतिलाल घिया से सात वोटों से जीत गए।

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इसके बाद चिमनभाई पटेल ने 18 जुलाई, 1973 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वह पाटीदार समुदाय से मुख्यमंत्री बनने वाले पहले शख्स बने। चिमनभाई पटेल लंबे समय तक इस पद पर नहीं रह सके। उन्हें इंदिरा गांधी से अदावत करने और उन्हें चुनौती देने की भी कीमत चुकानी पड़ी। मूल्य वृद्धि और करप्शन के आरोपों पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें 9 फरवरी 1974 को पद से हटा दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया। राज्य में नव निर्माण आंदोलन को देखते हुए इंदिरा गांधी ने उन्हें पार्टी से भी निष्कासित करा दिया।

 

कांग्रेस से निष्कासित हुए पटेल

 

इससे पहले गांधी ने उन्हें पार्टी से इस्तीफा देने को कहा था लेकिन पटेल ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। तब पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में चिमनभाई पटेल को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ऐसा पहली बार हुआ था कि इंदिरा गांधी के निर्देशों का उल्लंघन करने की वजह से किसी नेता को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में उसी हफ्ते उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल कर नई राजनीतिक शक्ति प्राप्त की थी।

 

दोबारा बने मुख्यमंत्री

 

चिमनभाई पटेल 4 मार्च 1990 को जनता दल-बीजेपी गठबंधन सरकार का नेतृत्व करते हुए दोबारा गुजरात के मुख्यमंत्री बने। रथ यात्रा के दौरान बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद जब 25 अक्टूबर 1990 को गठबंधन टूटा तो, वह कांग्रेस के समर्थन से अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे। बाद में पटेल फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए और 17 फरवरी 1994 को अपनी मृत्यु तक कांग्रेस में बने रहे।

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