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भारत में स्वच्छता आन्दोलन के जन्मदाता- महान राष्ट्र संत गाडगे बाबा | ऑनलाइन बुलेटिन

राजेश कुमार बौद्ध

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय- प्रधान संपादक, प्रबुद्ध वैलफेयर सोसाइटी ऑफ उत्तर प्रदेश


 

संत गाडगे बाबा के घर छोड़ने के बाद उन्होंने गांवो-गावों में गन्दगी देखी, लोग कूड़ा कचरा खुले में, रास्तों के किनारे, बस्तियों के पास ही फेंक देते थे। खुले में और प्रायः रास्तों के किनारे ही गंदगी कर देते थे, घर में नहाने धोने का पानी रास्तों में निकाल देते थे। अक्सर सीढ़ीदार कुए होते थे जिनमें लोग अक्सर जूते पहन कर उतर जाते उसी में नहाते और उसी का पानी भी पीते, यही वजह थी कि वे गन्दगी से उपजी बीमारियों के शिकार होते, मलेरिया, हैजा, आन्त्रशोथ जैसी बीमारियां इसीलिए फैल रही थीं।

 

संत गाडगे नें इसीलिए अपनी जन सेवा का आगाज ही स्वच्छता से किया। झाडू हमेशा उनके हाथ में रहता, वे लोगों के यहां खुद सफाई करके उन्होंने देशवासियों को स्वच्छता का मूल मंत्र दिया, लेकिन दुःखद कि गाधीवादियों ने गांधी को महिमामंडित करने के लिए झूठ- मूठ ही प्रचारित कर रखा है कि गांधी स्वच्छता आन्दोलन के जन्मदाता है, लेकिन कैसे यह बताने में वे आज तक नाकाम रहे हैं।

 

दरअसल, उनके पास इस बात का कोई जवाब ही नहीं है,जबकि काल क्रम के आधार पर संत गाडगे बाबा इसके जन्मदाता हैं,गांधी ने तो लोगों को गंदगी का टोकरा सर पर उठवा दिया था। दरअसल, गांधीजी खुद गाडगेबाबा से प्रभावित थे तथा उनसे भेंट करने को उत्सुक भी थे जबकि गाडगे अपने जन सेवा मिशन में जुटे थे, गांधी न केवल बाबा के नाम से सन 1935 से भी पहले से परिचित थे बल्कि उनके महान कायों के बारे में भी जानते थे।

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बाबा से भेंट करने की गांधी की इच्छा को पूरा किया था बी.जी. खैर नें, संत गाडगे बाबा का वर्धा की तरफ कीर्तन था, बी.जी.खेर ने गाधी को सूचित किया 31 नवम्बर सन 1935 को वर्धा के सेवा ग्राम में गाडगे बाबा और गांधी जी की मुलाकात हुई, दोनों के बीच अनेक विषयों पर बात हुई गाडगे बाबा को गांधी ने कुटिया के सामने वाले चबूतरे पर बैठाया।

 

हजारों लोग बाबा को देखने जुटे थे,कस्तूरबा गांधी,रामदास गांधी ने बाबा की रूचि का भोजन परोसा ,- मिर्च,प्याज,अरहर की दाल और ज्वार की रोटी,गांधी ने गदगद होते हुए कहा-“ गरीब लोग जैसा भोजन करते हैं बाबा भी वैसा ही खाते हैं।

 

बाबा की दो बेटियों की शादी हो चुकी थी,उनके एक ही पुत्र था,- गोविन्दा, बाबा के गृहत्याग के बाद उसका बचपन बड़े ही कष्टों में बीता उसे विद्या अध्ययन के लिए पूना के शिवाजी मराठा छात्रावास में भेज दिया गया था,गोविन्दा की शादी बचपन में ही कर दी गई थी उस समय दलित जातियों में छोटी अवस्था में ही शादी कर देने का रिवाज था,7- 8 वर्ष की उम्र तक जिस लड़के की शादी न हो पाती थी उसे ‘घोड़वर’ कह कर चिढ़ाया जाता था इसी प्रकार लड़की के लिए घोड़वधू ‘ शब्द प्रचलित था।

 

5 मई 1923 को अचानक पागल कुत्ते के काटने से गोविन्दा की मृत्यु हो गई,गाडगे बाबा गोविन्दा की मृत्यु पर जरा भी विचलित नहीं हुए बल्कि दुःख और दर्द का घूँट अंदर ही अंदर पी कर रह गए,और न ही उन्होंने मानव कल्याण के मिशन को ही त्यागा था, उस समय रत्नागिरी जिले के खारेपाटण गांव में गाडगे बाबा का कीर्तन था, वहां उन्हें उनके एकलौते बेटे की अकाल मृत्यु का संदेश भेजा गया।

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गाडगे बाबा एक कीर्तन के लिए तैयार हुए थे उसी समय एक व्यक्ति संदेश लेकर उनके पास आया,और उसने रोते हुए बताया कि बाबा ,- गोविंदा अब इस दुनिया में नहीं रहा, इस पर गाडगे बाबा ने कहा,“ अनगिनत लोग मेरे बेटे के जैसे ही मर चुके हैं,आज एक और बेटा मर गया, फिर अब एक के लिए रोने से क्या फायदा ? ”और फिर वे अपने कीर्तन में लग गए और उन्होंने इस घोर विपत्ति को भी बड़ी सहजता से सहन कर लिया था,पर अपनें मिशन को कभी नहीं त्यागा।

 

पर दुःखद कि यह वही देश है जिसमें उस गांधी को सफाई का जनक बताया जाता है जिसका सफाई से दूर दूर तक कहीं कोई वास्ता नहीं था,उल्टे लोगों को गंदगी में ही ताउम्र मरने के लिए सर पर गंदगी का टोकरा रखकर आध्यात्मिक सुख बताया था,पर जिन्होंने लोगों का दुःख दर्द दूर करनें के लिए अपना सबकुछ त्याग दिया। आज उन्हें दफन करने के लिए चश्में को सफाई अभियान का प्रतीक बनाया, गाडगे बाबा नें लोगों को साफ रहना सिखाया।

 

साथ ही पीने के स्वच्छ पानी के लिए जगह जगह कुँओं का निर्माण कराया, लोगों को ठहरने के लिए जगह जगह धर्मशालाएं बनवाई, लोगों के इलाज के लिए जगह जगह अस्पताल बनवाये तथा लोग शिक्षित बनें इसके लिए जगह जगह कई छोटे बड़े स्कूल बनवाये जो आज भी गाडगे बाबा के मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं-

“कोटि कोटि नमन बाबा”

 

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