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बुलडोजर से दिन के उजाले में न्याय की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, हम आंख नहीं मूंद सकते | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

नई दिल्ली | [कोर्ट बुलेटिन] | दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र की अंतरात्मा के रक्षक होने के नाते, जब दिन के उजाले में न्याय के सिर पर बुलडोजर चलाया जा रहा हो, तो अदालत आंख नहीं मूंद सकती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यह न्याय का उपहास है कि सार्वजनिक भूमि पर एक धर्मार्थ अस्पताल चलाने, उपचार सुविधाएं प्रदान करने जैसे नेक काम में योगदान देने वाली संस्था को लीज डीड को लेकर इस तरह का सामना करना पड़ रहा है।

 

दिल्ली हाई कोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर बने एक धर्मार्थ अस्पताल के लीज डीड को रद्द करने के आदेश को कैंसिल करते हुए उक्त गंभीर टिप्पणी की है।

 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने कहा, कानून, जो कल्याण सुनिश्चित करने का एक साधन होना चाहिए, को वर्तमान मामले में अत्याचर के एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा है।

 

एक संवैधानिक अदालत और लोकतंत्र की अंतरात्मा की रखवाली होने के नाते, यह अदालत उस समय आंख नहीं मूंद सकती जब दिन के उजाले में न्याय के सिरों पर बुलडोज़र चलाया जा रहा हो।

 

हाई कोर्ट ने कहा कि संस्था राज्य के कल्याण कार्यों का काम कर रही है ऐसे में इसका अनुचित उत्पीड़न कानून के शासन का अभिशाप होगा।

 

कोर्ट खोसला मेडिकल इंस्टीट्यूट की एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसने शालीमार बाग में एक चिकित्सा अनुसंधान केंद्र और अस्पताल की स्थापना की थी। दिल्ली विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने लीज डीड को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि संस्थआन ने उन्हें नए सदस्यों के रूप में शामिल करके संपत्ति को तीसरे पक्ष को हस्तांतरित कर दिया था और लीज डीड की शर्तों का उल्लंघन किया था।

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हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत यह विचार करने में भी विफल रही कि संस्थान के स्वामित्व और स्वामित्व को किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई निर्णायक सबूत या दस्तावेज नहीं था क्योंकि न तो कोई डीड ऑफ ट्रांसफर, टाइटल डीड या कोई अन्य दस्तावेज नहीं था।

 

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