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दो जून की रोटी do joon kee rote

©नीलोफ़र फ़ारूक़ी तौसीफ़

परिचय– मुंबई, आईटी टीम लीडर


 

 

मेहनत का पसीना नहीं ख़ून बहाया।

आज हमने दो जून की रोटी खाया।

 

कूड़े के ढेर में, कुछ बच्चे तलाशते रहे,

रोटी का टुकड़ा देखते ही,मुँह में डालते रहे।

 

क़ीमत क्या जाने , जिसका पेट भर गया,

वही रोटी का टुकड़ा, कचड़े में सड़ गया।

 

ये तपिश ये गर्मी लहूलुहान कर गयी,

अन्न उगाने वाले की बच्ची भूख से मर गयी।

 

बड़े नसीब से दो जून की रोटी मिलती है,

अग्नि में तप कर ही ये रोटी मिलती है।

 

नीलोफ़र फ़ारूक़ी तौसीफ़

Nilofar Farooqui Tauseef

two june bread

 

The sweat of hard work did not shed blood.
Today we ate roti of June 2.

In the garbage heap, some children kept searching,
As soon as he saw a piece of bread, he kept putting it in his mouth.

What is the price, whose stomach is full,
The same piece of bread rotted in the dust.

This heat, this heat has bled,
The child of the grower died of hunger.

With great luck, we get the bread of June 2,
This bread is obtained only by doing penance in the fire.

 

 

 

 

प्रकृति परमात्मा का सुंदर उपहार है prakrti paramaatma ka sundar upahaar hai

 

 

 

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