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हम जैसा सोचते हैं… वैसा बनते हैं ham jaisa sochate hain… vaisa banate hain

©पूनम सुलाने-सिंगल

परिचय– जालना, महाराष्ट्र


 

 

‘जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे’ यह बात हम लोग अक्सर सुनते हैं। हमारी अपनी सोच का परिणाम न केवल हमारे अपने उपर बल्कि,, हमसे जुड़े हुए हर व्यक्ती, पेड़-पौधे और हमारे अपने आसपास के जानवरों के उपर तक दिखाई देता है।

 

मानवी विचार और उसका दूसरों पर होने वाले प्रभाव को लेकर 10 साल तक एक प्रयोगशाला में प्रयोग करने के बाद जो निष्कर्ष निकला वो यह है कि अगर हम ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं जिसके मन के विचार सभी के प्रति सकारात्मक और कल्याण की भावना से परिपूर्ण है। ऐसे व्यक्ति के पास जाने से हमारे शरीर में 1500 तक सफेद रक्त कोशिकाओं (white sales) का प्रमाण बढ़ जाता है।

 

उसके अलावा हम अगर ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं; जिनके भीतर अपने आसपास के व्यक्तियों के लिए नकारात्मक, द्वेष और घृणा की भावना ऐसे व्यक्ति के पास जाने से हमारे शरीर से 1600 सफेद रक्त कोशिकाएं कम होने लगती है।

 

इस निष्कर्ष से हम अपने विचारों के परिणाम का अंदाजा लगा सकते हैं।

 

इसलिए, हमें हमेशा अपने प्रति या किसी और के प्रति कुछ भी सोचने से पहले इतना तो जरुर सोच-विचार कर लेना चाहिए कि मेरी सोच का मुझपर या मेरे आसपास के माहौल पर क्या परिणाम होगा।

 

 

पुनम सुलाने-सिंगल

What we think, we become

 

We often hear this saying ‘you will become as you think’. The result of our own thinking is visible not only on ourselves, but also on every person related to us, trees and plants and animals around us.

 

After experimenting in a laboratory for 10 years about human thought and its effect on others, the conclusion that came out is that if we go to such a person whose thoughts of mind are positive towards all and full of feeling of well-being. Is. Going to such a person increases the amount of white blood cells in our body up to 1500.

 

Apart from that, if we go to such a person; In whom there is a feeling of negative, hatred and hatred for the people around us, by going to such a person, 1600 white blood cells start decreasing from our body.

 

From this conclusion we can judge the result of our thoughts.

 

Therefore, we should always think so much before thinking anything towards ourselves or anyone else that what will be the result of my thinking on me or the environment around me.

 

 

 

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