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काव्य संग्रह कस्तूरी से सुगंध फैलाती वसुधा गोयल kaavy sangrah kastooree se sugandh phailaatee vasudha goyal

वसुधा गोयल का काव्य संग्रह कस्तूरी में एक सुंदर भावों से, सुंदर एहसासों से संजोया गया अनुभव से साहित्य संसार को मूर्त रूप देकर कस्तूरी की तरह सुगंध फैलाता है। अपनी मस्त मिजाज की कवयित्री वसुधा गोयल अपने सरल शब्दों में अनुभव के आकाश का आधार लिए अपने जीवन में संघर्ष, पीड़ा, दु:ख, दर्द की व्यथा – कथा को अपनी लेखनी के माध्यम से शब्दों के आकार में ढलती- खिलती रचनाओं को जन्म देकर हरेक के जीवन को एक ऊर्जावान संदेश देती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सब के जीवन की कहानी को कहती है। कवयित्री न्यायशील है। यथार्थवादी है। अपनी रचनाओं में पाठकों के अंतर्मन को झकझोरती है।

 

अपनी रचना ‘घुंघरू’ में स्त्री की दास्तान को पेश करती हुई कवयित्री कितना सुंदर कहती है-

 

“जिंदगी की तस्करी के सारे लम्हें

जब गमों की बारिश में डूबते हैं,

खामोश हो गई उन रातों में

तवायफ के घुंघरू बज उठते हैं।”

 

नारी को शिक्षा का पूर्ण अधिकार देने पर तो समाज, देश, दुनिया में चमत्कार से कम नहीं है ।नारी का दूसरा नाम ही निर्माण है। अपनी रचना “शिक्षा का अधिकार’ में कवयित्री कहती है-

 

“करना है अगर समर्थ समाज का निर्माण

करों नारी को शिक्षित, करो उसका सत्कार

मैं जननी, मैं निर्माणी, मुझ से बने संसार

कर लो तुम पूर्णतः मेरा अस्तित्व स्वीकार।”

नारी के नए आयामों को घढ़ती हुई वह नारी को आत्मविश्वास के साथ मजबूत बनाती हुई कहती है-

“होने ना दूंगी ज़ोहर, ना खेलेगा कोई चौसर

अपनी अस्मिता की खातिर अब खुद ही लड़ना होगा।”

 

वे कहती है कि नारी अपने वजूद को भूल गई है वह अपनी शक्ति को पहचानेगी तो वह महाशक्ति बन जाएगी। नारी की आजादी के लिए वह लड़ उठती है, चिख उठती है।

 

“मैं नारी अपने ही दर्पण में

खुद की पहचान भूल गई।”

अब नारी स्वयं के बारे में चिंतन मनन करने लगी है और कई सवाल करने लगी है-

” मैं खुद ही खुद से एक सवाल करती हूं

क्यों है यह जीवन परिधि में बंधा,

क्यों यह समाज सीमाएं निश्चित करता है

.. क्यां पहनूं, क्या खाऊं, कैसे चलो, कैसे हंसो”

 

आज की नारी अपना पूर्ण रूप से वास्तविक सम्मान चाहती है ना कि औपचारिक सम्मान के दर्प से ढकना-

 

“नहीं चाहिए देवी, पूज्य वंदनीय का दर्जा

पूर्ण सम्मान मिल जाए, यही है स्वेच्छा”

 

वास्तविकता में जीना ही जीना है, आपको विश्वास के साथ वह अपनी रचना ‘जमीर’ में कहती है- “मुकम्मल है उल्फत का पैमाना लुटाती हूं खुशियों का खजाना

 

उठकर चल देती हूं गिरकर दोबारा

लाचारी बैसाखी की कभी भाई नहीं

मुफलिसी में हमें मंजूर है।”

रचना “गुलाम” में कहती है –

“विवशता कुछ ना कह पाने की

दुर्बलता अधीन बने रहने की

उसकी हिम्मत है सब दु:ख सहने की

गुलामी नहीं तो क्या है?”

 

इस तरह कहीं-कहीं नारी की पीड़ा से कवयित्री

आक्रोशित हो उठती है। यथार्थ और न्याय के तराजू से तोलते हुए सच्चाई को कहने की हिम्मत करती है।

 

मातृभाषा हिंदी के प्रति विशेष प्रेम को दिखाती हुई कहती है –

“हिंदी मेरी मातृभाषा

प्रजातंत्र की शास्त्र की भाषा।”

कवयित्री सूक्ति बद्ध शैली में कहती है-

‘सच के लिए सदा खड़े रहो

अपने हक के लिए अड़े रहो।”

 

रचना ‘अखबार’ में आज के हालात को बयां करती हुई कहती है-

 

“कहां फेंका गया तेजाब

कहां लूटा गया हिसाब

कहां दुल्हन आग में जली

कहां खिलने से पहले मुरझाई कली

कहां नवजात ढेर में मिली

अफसोस में कितनी मोमबत्तियां जली…

निष्पक्ष रह कर लिखा करो सच्चाई

निडर होकर करो, नेताओं की खिंचाई”

 

रचना धर्मी अपनी साहित्य सेवा से जन का कल्याण करता है। ‘कवि और कविता’ में सुधा गोयल कहती है-

 

“कर देते जंकृत ह्रदय को

उसके शब्दों के बाण

सोचने पर मजबूर करता

होता जनकल्याण।”

 

एक साहित्यकार की कलम सदा ईमान से अपनी लेखनी को पथ प्रदर्शक की तरह आगे बढ़ाएं और न रुके न झुके सदा सत्य की राह का निर्माण करें। वही सच्चा कलमकार है। जो समय परिस्थिति के अनुसार सदा खूबसूरत अल्फाज से न्याय की रेखा को खींचे।

 

कवयित्री के मन में कसक है, कई पीड़ा है, उलझन है। जो शब्दों में बयान करती हुई अपनी रचना ‘उलझन’ में दिल की अकुलाहट से स्पष्ट तड़प नजर आती है; कहती है-

 

“जीने को तो जी लेंगे पर सब कुछ अधूरा लगता है ।

तुझमें ही तो खुद को खोकर मुझ को पुरा लगता है।”

‘दाग’ में वियोग की तड़प एक विरहणी की भांति स्पष्ट नजर आती है-

“कसमसाती रही मिलन की आरजू

यादों में तुम मेरी इतने आबाद थे।”

‘लफ्जों का खेल’ में- वाणी का व्यवहार में ढलना दुनिया का बहुत बड़ा गुण।

“लफ्जों का खेल यह जीवन सारा

लफ्जों के आगे हर कोई हारा।”

 

रचना “ज़िद” में संघर्षों के प्रतीक सदा अपनी जिद पर डटे रहते हैं उनके संकल्प सदा मजबूत होते हैं इसलिए आशा और विश्वास पर टिके रहते हैं-

 

“संकल्प लिए खड़ा रहा

अपनी जिद पर अड़ा रहा…

टूटने लगी थी आस थमने लगी थी सांस

लेकिन अवरोधों के आगे

तान सीना खड़ा रहा।”

 

सकारात्मक सोच के साथ हिम्मत के फूल सदा मंजिल तक जाते हैं । रचना ‘हिम्मत’ में श्रीमती गोयल कहती है –

 

“अपने हौसलों को आजमाना है

मुश्किलों में भी मुस्कुराना है।…

सुख दुःख तो आना जाना हैं

भरोसा कर लिया जब खुद पर

निरंतर चलते जाना है

नई मंजिलों को पाना हैं।”

 

कथनी करनी में नेताओं को अक्सर पाते हैं सदा झूठ बोलकर जनता को ललचाते हैं रचना ‘नेता जी’ में-

 

“भाषण खूब नेताजी ने दिया श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।”

कवयित्री वसुधा मन में उम्मीद लिए अटूट विश्वास, हर्ष, हंसी-खुशी और एक अद्भुत साहस से नए संकल्प के साथ लक्ष्य को पाने के लिए नववर्ष का अभिनंदन करती हुई कहती है -“नए वर्ष का अर्थ यही है।

 

साहसी जो समर्थ वही है

भूल कर पीर पुरानी अपनी

दिखला दो हम असमर्थ नहीं है।”

 

वसुधा गोयल जबरदस्त प्रेरित करने वाली उत्तम रचना ‘पसीने की स्याही’ में लिखती है -“पसीने की स्याही से

 

लिख अपने मुकद्दर को

पार हो जाएंगे कठिन रास्ते

पहचान अपनी असीमित क्षमताओं को।”

 

प्रेरित करने वाली ‘प्रेरणा’ में सोए हुए को जागृत करती है तो मरे हुए में जान भरती है-

 

“चाहे कितनी हो बाधाएं

मन में भर ले आशाएं

चाहे कितना अन्याय हो

साथ हमेशा न्याय का हो

मन में अधिक विश्वास लेकर

एक नई इबारत तुम लिख दो

हिम्मत को हथियार बनाकर

इस धरा को उज्ज्वल कर दो।”

 

आशावादी कवयित्री वसुधा गोयल अपनी आशा रूपी दीप से मन के अंधियारे को मिटाने की बात करती हुई ‘आशा का दीप’ रचना में यही कहती है –

 

“अंतस में प्रेम की बूंद डालूं

दरिया नेह का बनने लगा है,

गम का तम हटाकर

खुशियों का सागर बहने लगा हैं।

आशा का दीप जला हैं

मन का अंधियारा मिटने चला है।”

 

विश्व महामारी में संदेश देती हुई अपनी रचना ‘लोकडाउन’ के माध्यम से श्रीमती गोयल कहती है –

“अपनों को ना हो कोरोना

 

हर वक्त यही दुआ थी

ना पैसा ना कार ना कोठी

रिश्तों की जमापूंजी सबसे बड़ी थी।”

रचना ‘रिक्तता’ में संदेश देती हुई कहती है-

“स्वाभिमान की ज्वाला में स्वार्थ को जलने दो

जेहन में रिक्तता मत पनपने दो।”

 

संवेदनशील कवयित्री ‘बालश्रम’ रचना में श्रीमती गोयल लिखती है कि-

 

“कानून तो बना दिया ना तो कभी बालश्रम

पेट की आग के आगे सारे नियम केवल भ्रम।”

 

वसुधा गोयल एक सधी हुई, अनुभवी एवं मानवतावादी कवयित्री है। देश की संस्कृति सभ्यता गीत गाने वाली है।

 

जज्बा, जोश और उम्मीद के दीए जलाने वाली कवयित्री में बहुत ही कशिश है। अपनी रचना ‘कशिश’ में कितना सुंदर कहती है-

 

“नींद नहीं आती मगर आंखों में ख्वाब बहुत हैं दूर बैठा हैं तु मगर तेरी कशिश बहुत है।”

 

अपनी रचनाओं में उम्मीद के दीए जलाकर एक नवीन संदेश देने की उम्मीद देती कवयित्री श्रीमती वसुधा गोयल का यह काव्य संग्रह कस्तूरी जो पाठकों को साहित्य की महफिल में सुगंध फैलाए बिना नहीं रह सकता है। मैं आशा ही नहीं बल्कि उम्मीद और विश्वास करता हूं कि वसुधा गोयल अपने साहित्य सृजन से साहित्य जगत को काव्य सुधा रस का पान कराती रहे। अपनी साहित्य सेवा के माध्यम से साहित्य प्रेमियों में ज्ञान का संचार करती रहे। नई दिशा, संदेश एवं आशा की किरणों से काव्य जगत को जगमगाती रहे इसी आशा और विश्वास के साथ मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मंगल कामनाएं करता हूं।

 

©Kanti Lal Yadav

©डॉ. कान्ति लाल यादव

परिचय– उदयपुर, राजस्थान.

 

 

Vasudha Goyal spreads fragrance from the poetry collection Musk

 

 

Vasudha Goyal’s poetry collection Kasturi spreads fragrance like musk by embodying the literature world with a beautiful emotion, with beautiful feelings. Vasudha Goyal, the poetess of her cool mood, took the basis of the sky of experience in her simple words, the struggle, pain, sorrow, agony of pain in her life – through her writing, giving birth to the compositions that mold into the shape of words. Gives an energetic message to everyone’s life. It seems like it tells the story of everyone’s life. The poet is fair. is realistic. She shakes the heart of the readers in her works.

 

Presenting the story of a woman in her composition ‘Ghungroo’, how beautiful the poetess says-

“All the moments of life’s smuggling
When drowning in the rain of sorrow,
Silent in those nights
Tawaif’s bells are ringing.”

Giving women the full right to education is nothing short of a miracle in the society, the country, the world. Another name for a woman is construction. In her work “Right to Education” the poet says-

 

“If a capable society is to be built
Do educate the woman, give her hospitality
I am the mother, I am the factory, the world made of me
Please accept my existence completely.”
While crafting new dimensions of woman, she makes the woman strong with confidence and says-
“I will not let Zohar happen, no Chaucer will play
Now you have to fight for your own identity.

She says that the woman has forgotten her existence, if she recognizes her power, then she will become a superpower. For the freedom of women, she fights, screams.

 

“I am a woman in my own mirror
Forgot my identity.”
Now the woman has started contemplating about herself and has started asking many questions-
“I ask myself a question
Why is this life tied in the periphery,
Why this society sets boundaries
.. what to wear, what to eat, how to walk, how to laugh”

Today’s woman wants full real respect and not to be covered with the guise of formal honour.

“Don’t want goddess, worshipable status
Full respect should be given, this is voluntary.

 

To live in reality is to live, she says with confidence in her composition ‘Zameer’ – “The scale of Ulfat is complete, I spend the treasure of happiness”.

get up and walk again
Helpless crutches never have a brother
In failure we are accepted.”
In the composition “Slave” it says –
“The compulsion to say nothing
infirmity
He has the courage to bear all the sorrows
If not slavery then what is?”

Somewhere like this, the poetess is suffering from the pain of the woman.
Gets angry. Dare to speak the truth while weighing the scales of truth and justice.

 

Showing special love for mother tongue Hindi says –
“Hindi is my mother tongue
The scriptural language of democracy.”
The poetess says in a hymn-bound style-
‘Stand up for the truth forever’
Stand up for your rights.”

Describing today’s situation in the ‘newspaper’, the composition says-

“Where was the acid thrown?
where was the account robbed
where the bride burned in the fire
where bud fades before blooming
where was the newborn found in the heap
How many candles lit in regret…
be fair and write the truth
Be fearless, pull up the leaders”

 

The righteous man does the welfare of the people through his literary service. Sudha Goyal in ‘Kavi Aur Kavita’ says-

“Take a broken heart
of his words
makes you think
It was public welfare.”

Let the pen of a writer always lead your writing with faith as a guide, and never stop or bow down, always build the path of truth. He is the true penman. Whoever, according to the time and circumstance, always draws the line of justice with beautiful alphabets.

 

There is tension in the mind of the poetess, there is many pains, there is confusion. Which expressing in words, in his composition ‘Tangled’, clearly yearning is seen from the turmoil of the heart; says-

“You will live to live, but everything seems incomplete.
Losing myself in you makes me feel complete.”
The yearning of separation in ‘Dag’ is clearly visible like a detachment-
“The love of meeting kept on swearing
You were so in my memory.”
In the ‘Game of words’ – the most important quality of the world is to mold speech into practice.
“The game of words is all this life
Everyone lost before words.”

 

In the composition “Zid” the symbols of struggles always stand on their insistence, their resolves are always strong, so they stay on hope and faith-

“Standing up
Stick to your insistence…
The hope was starting to break, the breath had stopped
but before the barriers
Tana Cena stood up.”

Flowers of courage always go to the destination with positive thinking. In the composition ‘Himmat’, Mrs. Goyal says –

 

“Try your spirits
To smile even in difficulties.
Happiness has to come and go
trusted myself when
have to keep going
New floors to be found.”

Often we find leaders in words and deeds, always tempt the public by telling lies, in the composition ‘Neta ji’-

“The speech given by Netaji mesmerized the audience.”
Poet Vasudha greets the new year with hope in the mind, with unwavering faith, joy, laughter and a wonderful courage to achieve the goal with a new resolution – “This is the meaning of the new year.

 

courageous is the one who is capable
Forgetting your old pir
Show me we are not incapable.”

Vasudha Goyal writes in the most inspirational masterpiece ‘Sweaty Ink’ – “With the ink of sweat

write your case
hard way to cross
Recognize your limitless capabilities.”

Inspire ‘inspiration’ awakens the sleeping, then gives life to the dead-

 

“No matter how many obstacles
fill your heart with hope
no matter how unfair
always be fair
with more confidence
write a new script
making courage a weapon
Make this earth bright.”

Optimistic poet Vasudha Goyal talks about erasing the darkness of the mind with her lamp of hope, says this in the composition ‘Deep of Hope’ –

 

“Let me put a drop of love in the heart
Daria Neh has started becoming
removing gum
The ocean of happiness has started flowing.
the lamp of hope is lit
The darkness of the mind has gone away.”

Giving a message in the world pandemic, through her work ‘Lokdown’, Mrs. Goyal says –
“Don’t have corona to your loved ones

was always the same prayer
no money, no car, no cottage
The pool of relationships was the biggest.”
Giving a message in the composition ‘Vacancy’, it says-
“Let selfishness burn in the flame of self-respect

 

Don’t let emptiness arise in your mind.”

In the composition ‘Balshram’, the sensitive poetess, Mrs. Goyal writes that-

“Law has been made, nor has it ever been child labor.
Before the fire of the stomach, all the rules are only illusions.”

Vasudha Goyal is a simple, experienced and humanistic poet. The culture of the country is about singing civilizational songs.

There is a lot of effort in the poetess who light the lamp of passion, enthusiasm and hope. How beautiful she says in her composition ‘Kashish’-

“I can’t sleep, but there are many dreams in my eyes, you are sitting far away, but you have a lot of love.”

 

This poetry collection of poetess Smt. Vasudha Goyal, hoping to give a new message by lighting the lamp of hope in her compositions, which cannot live without spreading fragrance to the readers in the gathering of literature. I do not only hope but hope and believe that Vasudha Goyal, through her literary creation, continues to give the literary world a drink of poetry.  Through his literary service, he continued to spread knowledge among literature lovers. I wish them all the best with this hope and belief that the poetic world continues to shine with new directions, messages and rays of hope. I wish you good luck.

 

©Kanti Lal Yadav

Kanti Lal Yadav

Assistant Professor Udaipur Rajasthan

 

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