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झांसी की रानी लक्ष्मी बाई | Onlinebulletin.in

©द्रौपदी साहू (शिक्षिका), कोरबा, छत्तीसगढ़ 

परिचय- जिला उपाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी महासभा.


 

 

लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमति और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी। मनु छोटी ही थी, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग प्यार से “छबीली” कहकर बुलाने लगे।

 

मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली। सन् 1842 में उनका विवाह झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुई। वे झांसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी।

 

सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक ख़तरनाक भी थी।

 

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सन् 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र झांसी था। जहाँ हिंसा भड़क उठी थी। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।

 

1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली।

 

तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया। बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया और रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें राखी भेजी थी इसलिए वह भी इस युद्ध में उनके साथ शामिल हुए। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रितानी सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई।

 

1857 की राज्यक्रान्ति की प्रथम शहीद वीरांगना रानी अवन्ति बाई लोधी (20 मार्च 1858) के बाद द्वितीय शहीद वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई (18 जून 1858) थीं। उन्होंने सिर्फ 29 वर्ष की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से युद्ध किया और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं।

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सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता से प्रभावित होकर उनके यश का गान करते हुए “झांसी की रानी” कविता की रचना की। जो हर बच्चे की जुबान पर होते हैं और वीरांगना लक्ष्मीबाई की शहादत की याद दिलाते हैं और प्रेरणा देते हैं कि नारी अबला नहीं है। वह चाहे तो सबकुछ कर सकती है और लोगों में एक नई उमंग और उत्साह का संचार करती है।

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