Shahid Ali Case- “Supreme Court के आदेश के बावजूद बर्खास्त कर्मचारी की Backdoor Entry की साजिश? पत्रकारिता विश्वविद्यालय में उठा बवाल!”
Shahid Ali Case-
Shahid Ali Case- रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एक बार फिर सुर्खियों में है। मामला Shahid Ali और Sanjay Dwivedi की विवादित नियुक्तियों का है, जो पहले ही अदालतों में चुनौती का सामना कर चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बर्खास्त किए जा चुके हैं। लेकिन अब एक बार फिर से इन्हें “बैक डोर एंट्री” दिए जाने के प्रयास का आरोप सामने आया है।
⚖️ मामले की पृष्ठभूमि:
Shahid Ali Case- 17 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया जिसके बाद Shahid Ali को दिसंबर 2024 में उनके पद से बर्खास्त कर दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने नौकरी पाने के लिए फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र का इस्तेमाल किया था।
लेकिन 1 अप्रैल 2025 को विश्वविद्यालय के एक क्लर्क-स्तरीय कर्मचारी आकाश चंद्रवंशी ने रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर मामले को फिर से कार्यकारी परिषद में लाने की सिफारिश की। यह मामला 20 मई 2025 को कार्यकारी परिषद की बैठक में “किसी अन्य बिंदु” के तहत एजेंडे में जोड़ा गया।
⚠️ कानूनी राय का बहाना या साजिश?
यह ध्यान देने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहले ही इस मामले में कानूनी राय ली जा चुकी है। इसके बावजूद परिषद ने दोबारा “कानूनी राय लेने” की बात करते हुए बिंदु 16 में प्रस्ताव पारित किया।
डॉ. आशुतोष मिश्रा ने इस कदम को “सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना” करार दिया और 29 मई को इस संदर्भ में एक पत्र उच्च शिक्षा विभाग को भेजा। उनके पत्र पर कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति सचिवालय ने मामले को राज्य के मुख्य सचिव के पास जांच के लिए भेजा है।
? Shahid Ali और Sanjay Dwivedi पर पुराने आरोप:
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दोनों की नियुक्ति वर्ष 2005 में हुई थी।
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उन्होंने कथित रूप से गोपा बागची (Shahid Ali की पत्नी) द्वारा जारी फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र का इस्तेमाल किया था।
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मामला बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
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सुप्रीम कोर्ट ने Shahid Ali को बर्खास्त करने का आदेश दिया, जिसे कार्यकारिणी परिषद ने भी मंजूरी दी।
Sanjay Dwivedi ने कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में कुछ महीनों के भीतर ही पद त्याग दिया था, लेकिन उनके खिलाफ भी कार्यवाही लंबित है।
? डॉ. मिश्रा की मांगें:
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आकाश चंद्रवंशी के पत्र और प्रस्ताव की पृष्ठभूमि की जांच हो।
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कार्यकारी परिषद को अंधेरे में रखकर किए गए इस प्रयास पर सख्त कार्रवाई हो।
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सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश पर दोबारा राय लेने की आवश्यकता नहीं है, यह कानून का उल्लंघन है।
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विश्वविद्यालय में पारदर्शिता और न्यायिक आदेशों का पालन अनिवार्य किया जाए।
? प्रश्न जो उठते हैं:
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सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद मामला कार्यकारी परिषद में कैसे आया?
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एक क्लर्क स्तर का कर्मचारी ऐसा प्रस्ताव क्यों और किसके इशारे पर लाता है?
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क्या यह किसी बड़ी सिफारिश या अंदरूनी गठजोड़ का हिस्सा है?
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क्या Shahid Ali और Sanjay Dwivedi को क्लीन चिट देने की कोशिश हो रही है?
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? निष्कर्ष:
Shahid Ali Case- कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सामने आया यह मामला न्यायिक आदेश की अवहेलना, पारदर्शिता की कमी, और राजनीतिक-सामाजिक गठजोड़ की ओर इशारा करता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसे प्रयास लोकतंत्र और शिक्षा संस्थानों की गरिमा के लिए खतरे की घंटी हैं।
अब देखना यह है कि मुख्य सचिव और उच्च शिक्षा विभाग इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं।

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