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खनन से निकली मुहर दे रही ज्ञानवापी की गवाही, वाराणसी में बीएचयू के छात्र अंकुश गुप्ता ने किया शोध | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

वाराणसी | [उत्तर प्रदेश बुलेटिन] | काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी का प्रकरण अभी कोर्ट में है। ज्ञानवापी परिसर में मिली कथित शिवलिंग जैसी आकृति आखिर क्या है, उसका निर्धारण होना बाकी है। मगर काशी में अविमुक्तेश्वर की पूजा और प्रभाव की गवाही राजघाट के खनन से निकली लगभग 12 सदी पुरानी एक मिट्टी की मुहर दे रही है। बीएचयू के प्राचीन इतिहास विभाग के छात्र अंकुश गुप्ता ने अविमुक्तेश्वर के विश्वेश्वर और फिर विश्वनाथ के रूप में पूजे जाने पर यह शोध किया है।

 

काशी को अविमुक्त क्षेत्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि भगवान शिव कभी भी इस नगरी को नहीं छोड़ते। यह सिर्फ मान्यता नहीं बल्कि समयकाल में पीछे जाने पर आठवीं सदी में भी इसके साक्ष्य मिले हैं। प्राचीन इतिहास विभाग के शोध छात्र अंकुश गुप्ता ने बताया कि काशी की प्राचीनता पुराणों में सिद्ध है। इसके साथ ही बनारस के राजघाट में उत्खनन से आठवीं-नौवीं शताब्दी की अविमुक्तेश्वर लेख वाली मृणमुद्रा मिली है।

 

यह बीएचयू के भारत कला भवन में संग्रहित है। इसपर अविमुक्तेश्वर लिखे होने के साथ ही त्रिशूल और नंदी की आकृतियां भी बनी हैं। आठवीं सदी की मुद्रा यह स्पष्ट करती है कि उस काल में भी न सिर्फ अविमुक्तेश्वर की पूजा होती थी बल्कि इस क्षेत्र में उनकी मुहर या सील भी प्रचलित थी।

 

मध्यकाल तक आते-आते यह क्षेत्र विश्वेश्वर के नाम से लोक प्रचलित हो चुका था। जेम्स प्रिंसेप (1820-1830ई.) ने अपने चित्रों एवं वर्णनों में विश्वनाथ को विश्वेश्वर ही कहा है। काशी में विश्वेश्वरगंज बाजार भी इसकी गवाही करता है।

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शोध में आगे आक्रांताओं के हमलों और मंदिर के विध्वंस और पुनर्निमाण का जिक्र है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा जीर्णोद्धार के बाद विश्वनाथ का नाम प्रचलन में आया। देशभर के 12 ज्योतिर्लिंगों में यह सबसे ज्यादा महत्व वाला माना जाता है।

 

अंकुश गुप्ता ने यह शोधपत्र पुरालेख सम्मेलन में प्रस्तुत किया। शोध निर्देशक डॉ. विनोद कुमार जायसवाल ने बताया कि यह शोध आगे भी जारी रहेगा। इन साक्ष्यों के जरिए अविमुक्तेश्वर से विश्वनाथ बनने तक के और रहस्यों से पर्दा उठेगा।

 

कई बार हुए के विध्वंस के प्रयास

 

अविमुक्तेश्वर से विश्वनाथ बनने तक इसका कई बार विध्वंस और निर्माण हुआ। इतिहासकारों के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 11वीं सदी में राजा हरिश्चंद्र ने करवाया। 1194 में मोहम्मद गोरी ने इसे तेड़वा दिया था। कुतुबुद्दीन ऐबक और शहाबुद्दीन गोरी ने 1194 ईस्वी में वाराणसी को फतह किया और वाराणसी की हुकूमत उन्होंने अपने एक सूबेदार सैय्यद जमालुद्दीन के सुपुर्द कर दी।

 

मंदिर पुनः बनने के बाद वर्ष 1447 में इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तोड़वा दिया। 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर मंदिर तोड़ने के लिए सेना भेज दी लेकिन हिंदुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण यह संभव नहीं हो पाया था।

 

अंतिम बार अप्रैल-1669 में औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित पुस्तक मासीद ए आलमगीरी में इस ध्वंस का वर्णन है।

 

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