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बेटियां बोझ नहीं, भरण-पोषण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणी betiyaan bojh nahin, bharan-poshan kee maang vaalee yaachika par sunavaee ke dauraan kort kee tippanee

नई दिल्ली | [कोर्ट बुलेटिन] | एक महिला की याचिका पर सुनवाई करने के दौरान Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) ने शुक्रवार को कहा कि ‘बेटियां दायित्व नहीं हैं’। दरअसल एक बेटी की ओर से अपनी मां के निधन के बाद पिता से भरण-पोषण (Maintenance Matter) की मांग संबंधी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी।

 

सुप्रीम कोर्ट में बेटी के वकील ने दलील दी कि महिलाओं के अधिकारों (Women Rights) को दोहराते हुए कई कानून और फैसले पारित किए गए हैं, लेकिन यह कितना अचरज भरा है कि ये सभी (फैसले) 2022 में भी कई लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकते।

 

सुनवाई के दौरान पिता के वकील ने कहा, “बेटी एक दायित्व है।” इस पर जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ ने संविधान के अनुच्छेद 14 (Article 14) का हवाला देते हुए कहा कि, “बेटियां दायित्व नहीं हैं। वकील को संविधान के अनुच्छेद 14 को ठीक से देखना चाहिए।”

 

पहले ढाई लाख भुगतान का दिया था निर्देश

 

सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2020 को पिता को बेटी और उसकी मां, दोनों को 2 सप्ताह के भीतर ढाई लाख रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। लेकिन 6 सितंबर को 2021 को उसकी मां की मौत हो गई थी।

 

याचिकाकर्ता की शिकायत यह थी कि भरपोषण के बकाया के लिए किसी राशि का भुगतान नहीं किया गया, यानि बेटी के लिए 8 हजार प्रतिमाह और उसकी मां के लिए 400 रुपये प्रतिमाह का भुगतान नहीं किया गया था।

 

पिता ने अदालत को बताया था कि उन्होंने भरण पोषण के बकाया का भुगतान कर दिया है और उनके पास यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का स्टेटमेंट है।

 

अदालत ने इस विसंगति को देखते हुए रजिस्ट्रार (न्यायिक) याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादी की ओर से पेस वकील से स्थिति का पता लगाने के बाद एक तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करने को कहा था।

 

कोर्ट ने पिछले आदेश में कहा था कि प्रतिवादी, रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष सहायक दस्तावेज और सबूत प्रदान करेगा। इसी तरह याचिकाकर्ता के वकील को दूसरे याचिकाकर्ता के बैंक स्टेटमेंट पेश करने के लिए स्वतंत्र होगा जो यह प्रमाणित करेगा कि भुगतान प्राप्त हुआ है या नहीं। रजिस्ट्रार (न्यायिक) की रिपोर्ट आठ सप्ताह की अवधिके भीतर तैयार की जाए।

 

यह मामला जब शुक्रवार को सुनवाई के लिए आया तो बेंच को बताया गया कि महिला एक वकील है और उसने न्यायिक सेवा परीक्षा की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली है। इस पर बेंच ने कहा कि महिला (लड़की) को अपनी परीक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि वह अपने पिता पर निर्भर न रहे।

 

कोर्ट को यह सूचित करने के बाद कि बेटी और उसके पिता ने लंबे समय से एक-दूसरे से बात नहीं किया है, अदालत ने उन्हें बात करने का सुझाव दिया। कोर्ट ने पिता को 8 अगस्त तक अपनी बेटी को 50 हजार रुपये का भुगतान करने को कहा।

 

 

Daughters are not a burden, the court’s comment during the hearing on the petition seeking maintenance

 

 

New Delhi | [Court Bulletin] | During the hearing of a woman’s petition, the Supreme Court said on Friday that ‘daughters are not a liability’. In fact, after the death of her mother on behalf of a daughter, a petition was filed in the Supreme Court seeking maintenance from the father.

 

The daughter’s lawyer argued in the Supreme Court that many laws and judgments have been passed reiterating the rights of women, but it is astonishing that all these (decisions) have not changed the mindset of many people even in 2022. Can.

 

During the hearing, the father’s lawyer said, “The daughter is a liability.” On this, Justice D.Y. Chandrachud, citing Article 14 of the Constitution, said, “Daughters are not a liability. A lawyer should see Article 14 of the Constitution properly.”

 

 Instructions were given to pay 2.5 lakhs earlier

 

The Supreme Court on 5 October 2020 directed the father to pay an amount of Rs 2.5 lakh to both the daughter and her mother within two weeks. But on 6 September 2021, his mother died.

 

The complaint of the petitioner was that no amount was paid for the arrears of maintenance i.e. Rs.8,000 per month for the daughter and Rs.400 per month for her mother.

 

The father had told the court that he had paid the maintenance dues and had the statement of Union Bank of India.

 

In view of this discrepancy, the court had asked the Registrar (Judicial) to prepare a factual report after ascertaining the position from the counsel for the petitioners and the respondent.

 

The Court in its previous order had said that the respondent shall provide supporting documents and evidence before the Registrar (Judicial). Similarly, the counsel for the petitioner shall be free to produce the bank statements of the other petitioner which will certify whether the payment has been received or not. The report of the Registrar (Judicial) to be prepared within a period of eight weeks.

 

When the matter came up for hearing on Friday, the bench was told that the woman is a lawyer and has passed the preliminary examination of the judicial services examination. To this the bench said that the woman (girl) should concentrate on her examination so that she does not depend on her father.

 

After informing the court that the daughter and her father had not spoken to each other for a long time, the court suggested them to talk. The court asked the father to pay Rs 50,000 to his daughter by August 8.

 

 

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