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क्या कुछ लोग वामपंथी चरमपंथियों को बचाने के लिए कर रहे कोर्ट का इस्तेमाल, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पूछा यह सवाल kya kuchh log vaamapanthee charamapanthiyon ko bachaane ke lie kar rahe kort ka istemaal, supreem kort ne kyon poochha yah savaal

नई दिल्ली | [कोर्ट बुलेटिन] | इस साल केंद्र ने गृहमंत्रालय के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि जिला जज की एक रिपोर्ट कोर्ट रिकॉर्ड्स से गायब हो गई थी, जो सरकार को मार्च 2022 में मिली। केंद्र के अनुसार, रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि शिकायतकर्ताओं ने जिला जज के सामने बयान दिए थे कि कुछ अज्ञात लोगों ने जंगल से आकर ग्रामीणों की हत्या की है। साथ ही किसी ने भी सुरक्षा बलों के सदस्यों पर सवाल नहीं उठाए थे।

 

छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान आदिवासियों की न्यायेतर हत्या की जांच को लेकर 13 साल पुरानी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर 5 लाख रुपये का भारी भरकम जुर्माना भी लगाया है। इसके अलावा शीर्ष अदालत ने यह जांच की अनुमति दी है कि कुछ लोग और संगठन कोर्ट का इस्तेमाल कथित तौर पर वामपंथी चरमपंथियों के बचाने के लिए तो नहीं कर रहे हैं।

 

जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और 12 अन्य लोगों की तरफ से साल 2019 में दाखिल याचिका पर फैसला सुनाया। अदालत ने 19 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता कुमार को चार हफ्तों के अंदर 5 लाख रुपये की जुर्माना जमा करने के आदेश दिए हैं।

 

राशि जमा नहीं करने की स्थिति में कुमार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। खास बात है कि याचिकाकर्ता को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाले के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने ने दंतेवाड़ा में साल 2009 में 17 आदिवासियों की हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी। कुमार ने साल 2009 में दंतेवाड़ा जिले की तीन अलग-अलग घटनाओं में 17 ग्रामीणओं की मौत को लेकर अपनी तरफ से रिकॉर्ड गए बयानों के आधार पर याचिका दायर की थी।

 

फरवरी 2010 में एपेक्स कोर्ट ने दिल्ली के जिला जज जीपी मित्तल को 12 आदिवासी याचिकाकर्ताओं के बयान रिकॉर्ड करने के लिए कहा था। कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की बात भी कही थी। साथ ही उन्होंने सुरक्षा देने के भी आदेश जारी किए थे। इसके बाद जिला जज ने 19 मार्च 2010 को बयानों के संबंध में रिपोर्ट दाखिल की थी। तब शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को रिपोर्ट देने के आदेश दिए थे।

 

इस साल केंद्र ने गृहमंत्रालय के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि जिला जज की एक रिपोर्ट कोर्ट रिकॉर्ड्स से गायब हो गई थी, जो सरकार को मार्च 2022 में मिली। केंद्र के अनुसार, रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि शिकायतकर्ताओं ने जिला जज के सामने बयान दिए थे कि कुछ अज्ञात लोगों ने जंगल से आकर ग्रामीणों की हत्या की है। साथ ही किसी ने भी सुरक्षा बलों के सदस्यों पर सवाल नहीं उठाए थे।

 

इसके बाद केंद्र ने कोर्ट से किसी भी केंद्रीय एजेंसी को जांच के निर्देश देने की अपील की थी। इसके जरिए उन लोगों और संगठनों की पहचान की बात की गई थी, जो हिंसक माओवादी गतिविधियों को बचाने के लिए मुकदमेबाजी में शामिल हैं।

 

 

Are some people using the court to save the left extremists, why did the Supreme Court ask this question?

 

New Delhi | [Court Bulletin] | This year, the Center had filed a petition in the Supreme Court through the Ministry of Home Affairs. The petition said that a report of the district judge had disappeared from the court records, which was received by the government in March 2022. According to the Centre, the report has revealed that the complainants had given statements before the district judge that some unidentified people had come from the forest and killed the villagers. Also, no one had raised questions on the members of the security forces.

 

The Supreme Court has dismissed a 13-year-old petition seeking an inquiry into the extra-judicial killings of tribals during an anti-Naxal operation in Chhattisgarh. Along with this, the court has also imposed a hefty fine of Rs 5 lakh on the petitioner. Apart from this, the top court has allowed an inquiry into whether some individuals and organizations are using the court for allegedly protecting the Left extremists.

 

Justice AM Khanwilkar and Justice JB Pardiwala delivered the verdict on a petition filed by tribal rights activist Himanshu Kumar and 12 others in the year 2019. The court had reserved its verdict on May 19. Along with this, the court has ordered the petitioner Kumar to deposit a fine of Rs 5 lakh within four weeks.

 

In case of non-deposit of amount, action will be taken against Kumar. The special thing is that the petitioner is known to be sympathetic to the Maoists. He had demanded a CBI inquiry against the Chhattisgarh Police and central security forces in connection with the murder of 17 tribals in Dantewada in 2009. Kumar had filed the petition on the basis of his recorded statements regarding the death of 17 villagers in three separate incidents in Dantewada district in 2009.

 

In February 2010, the Apex Court had asked Delhi District Judge GP Mittal to record the statements of 12 tribal petitioners. The court had also talked about videography of the entire process. Along with this, he had also issued orders to give security. After this, the District Judge had filed a report regarding the statements on 19 March 2010. Then the top court had ordered all the parties to submit a report.

 

This year, the Center had filed a petition in the Supreme Court through the Ministry of Home Affairs. The petition said that a report of the district judge had disappeared from the court records, which was received by the government in March 2022. According to the Centre, the report has revealed that the complainants had given statements before the district judge that some unidentified people had come from the forest and killed the villagers. Also, no one had raised questions on the members of the security forces.

 

After this, the Center had appealed to the court to direct the investigation to any central agency. It sought to identify individuals and organizations that are involved in litigation to protect violent Maoist activities.

 

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