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याचिका खारिज कर हाईकोर्ट बोला- बेटे से ‌यौन उत्पीड़न का कृत्य वैवाहिक विवाद नहीं माना जा सकता | ऑनलाइन बुलेटिन

नई दिल्ली, | [कोर्ट बुलेटिन] | पिता द्वारा बच्चों का यौन शोषण के आरोप में दर्ज मामले को वैवाहिक विवाद के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। उच्च न्यायालय ने कहा है कि बेटे का यौन शोषण करने के आरोप में दर्ज मुकदमा रद्द करने की मांग को लेकर पिता द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।

 

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने दर्ज मुकदमा रद्द करने से इनकार करते हुए अपने फैसले में कहा कि बच्चे को न्याय पाने का अपना व्यक्तिगत संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि पीड़ित को न्याय पाने के अधिकार से महज इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता है कि आरोपी उसका अपना पिता है और उसके माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है।

 

न्यायालय ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी पिता के खिलाफ बच्चों को यौन उत्पीड़न से संरक्षण के लिए बने कानून पॉक्सो की धारा 10 और 12 के तहत दर्ज मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया।

 

आरोपी पिता ने याचिका में कहा था कि उसका अपनी पत्नी से विवाद चल रहा है, इसलिए उसे बेटे के यौन उत्पीड़न के झूठे मामले में फंसाया गया है।

 

आरोपी पिता पर अपने नाबालिग बेटे को गलत तरीके से छूने और 3 साल तक कई बार उसका यौन उत्पीड़न करने का आरोप है।

 

मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने याचिका का विरोध किया और कहा कि जब पीड़ित बच्चे की मां ने अपने नाबालिग बेटे की मनोस्थिति को जानने के लिए बाल मनोवैज्ञानिक से परामर्श लिया तो उसे पता चला कि बच्चे के साथ उसके पिता ने छेड़छाड़ की है।

 

इस मामले में आरोपी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को झूठा बताते हुए दर्ज मुकदमा रद्द करने की मांग की है। आरोपी ने मुकदमे को झूठा, मनगढ़ंत और आधारहीन तथ्यों पर आधारित बताया।

 

आरोपी ने न्यायालय को बताया कि उसकी पत्नी ने उसे फंसाने के लिए नाबालिग बेटे का इस्तेमाल किया है, ताकि वह अपने झूठे अहंकार को संतुष्ट कर सके।

 

 

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