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धम्मपद गाथा- जागने वाले को रात लंबी लगती है. थके हुए के लिए यात्रा लंबी हो जाती है. ऐसे ही अज्ञानी के लिए संसार भवचक्र लंबा होता है | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

डॉ. एम एल परिहार

©डॉ.एम एल परिहार

परिचय- जयपुर, राजस्थान.


 

The night seems long to the one who is awake. The journey becomes long for the weary. In the same way, the worldly life cycle is long for the ignorant. online bulletin dot in

 

       दीघा जागरतो रत्ति, दीघं सन्तस्स योजनं।

      दीघो बालानं संसारो, सद्धम्मं अविजानतं।।

जागने वाले की रात लंबी होती है। थके हुए के लिए योजन लंबा हो जाता है, यात्रा की दूरी लंबी हो जाती है। वैसे ही सद्धर्म को न जानने वाले मूर्ख मूढ़, अज्ञानी लोगों के लिए संसार (भवचक्र) लंबा हो जाता है।

 

सब मन पर निर्भर करता है, मन में क्या भाव पैदा होते हैं। व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही सब नजर आता है। सुख- दुख, उत्साह- आलस, दूर-नजदीक आदि का विचार पहले मन में ही पैदा होता है।

 

यदि किसी कारणवश रात को जागना पड़े या चिंता, पीड़ा के कारण नींद नहीं आई तो रात बहुत लंबी लगती है, क्योंकि वह अगली सुबह का इंतजार करता है।

 

दूसरी ओर गहरी नींद में सोये हुए व्यक्ति की रात जल्दी खत्म हो जाती है, रात कैसे बीत जाती है इसका उसको एहसास ही नहीं होता है। रात की समय अवधि तो दोनों के लिए समान है, रात वही है लेकिन दोनों के मनोभाव अलग-अलग हैं।

 

पैदल यात्रा कर रहे थके-मांदे राहगीर के लिए एक योजन (चार कोस दूरी) भी लंबी हो जाती है। दूरी तो वही है लेकिन थकान से भरे मनोभाव के कारण योजन बड़े हो जाते हैं।

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थकान, निराशा, दुख, चिंता से दूरी लंबी हो जाती है और आशा-उत्साह और साहस के मनोभाव से यात्रा छोटी हो जाती है।

 

एक उदाहरण से समझते हैं- यदि किसी के घर कोई खूंखार जहरीला जानवर, दुश्मन, चोर आ जाए तो वह भले ही कम समय तक रूक जाए तो भी एक-एक पल वर्ष के बराबर लगते हैं, क्योंकि उसके कारण मन में डर, चिंता, निराशा और दुख के भाव हावी हो जाते हैं।

 

और यदि व्यक्ति के पास कोई प्रिय वस्तु या व्यक्ति हो तो घंटों बीत जाने पर भी ऐसा लगता है मानो पलभर भी नहीं बीता, उनसे दूर होने का मन नहीं करता है।

 

सब मन में पैदा होने वाले विचारों का खेल है। जिंदगी खुशहाल हो तो समय जल्दी बीत जाता है और दुखभरी हो तो बेजान, बड़ी लंबी लगती है।

 

दुखों से भरी जिंदगी को मानो भारी बोझ की तरह ढोनी पड़ती है। समय का बोध, एहसास मन पर निर्भर करता है।

 

इस संसार में जिस जाग्रत, सावधान व्यक्ति ने जीवन का सत्य जान लिया, जिसने जीवन जीने की कला सीख ली, जो आनंद से जीने का ढंग जानते है। उनका जीवन जीने का नजरिया और तरीका अलग ही होता है।

 

ऐसे लोग स्वयं प्रसन्न रहते हैं और चारों ओर प्रसन्नता का उजियारा फैलाते हैं. और जिन्होंने दुखों के कारण आदत बना ली, उनकी जिदंगी अंधेरी रात के समान हो जाती है। सब जीवन जीने की कला, मन के भाव पर निर्भर है।

 

तथागत कहते हैं- जिसने सद्धम्म को नहीं जाना, उन बाल बुद्धि वाले, अबोध, अज्ञानी, मूर्ख, मूढ, नासमझ लोगों के लिए संसार की यात्रा लंबी हो जाती है।

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इनके लिए बार-बार जन्म लेने की जीवन यात्रा, भवचक्र, भवसागर अपार हो जाता है जिसे पार करना असंभव हो जाता है।

 

इससे अलग जिसने स्वयं को जान लिया, जो जाग्रत होकर सद्धम्म को जान लेते हैं। शील, समाधि और प्रज्ञा के पथ पर चलने वाले लोगों के लिए भवसागर पार करना आसान हो जाता है। इनके लिए भवसागर सिकुड़कर छोटा हो जाता है।

 

जो स्वयं के भीतर झांककर देखता है उसके लिए बाहर का संसार बहुत छोटा, सरल नजर आता है और जो स्वयं के भीतर देखने की बजाय बाहर की दुनिया में दौड़ता है, वह जितना दौड़ता है दुनिया उतनी ही फैलती जाती है वह उससे पार नहीं पाता है।

 

आखिर थक हारकर एक दिन मृत्यु को प्राप्त होता है, इसी तृष्णा भरे चित्त के साथ उसकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं और फिर जन्म लेता है।

 

सद्धम्म को जानने वाले की तृष्णा मिट चुकी होती है। वह प्रसन्न मन से सरलता से भवचक्र को पार कर लेता है, आवागमन से मुक्त हो जाता है.

 

सबका मंगल हो ….सभी प्राणी सुखी हो

 

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