समन्दर की गहराई न पूछो….
©गायकवाड विलास
परिचय- मिलिंद महाविद्यालय, लातूर, महाराष्ट्र
दरिया-दिली का वो दौर आज कहीं पीछे छूट गया है,
अब ये नया ज़माना तो देखो बेरहमी पर उतर आया है।
गरीबों में आज भी वो दरिया-दिली नजर आती है,
जहां दौलत का नशा है,वहां ये दरियादिली बकवास होती है।
दरिया-दिली और खुद्दारी ये दो अलग-अलग सी नीतियां है,
खुद्दारी ख़ुद का मान बढ़ाती है और दरियादिली को सदियां याद करती है।
आज करते है जो भी दरियादिली,उसे ये ज़माना पागल कहता है,
इन्सानियत जिंदा है जहां पे,वही पे ये दरियादिली का लहू बहता है।
दरिया-दिली करता हूं मैं,मगर कोई भी तम्मन्ना इस दिल में नहीं है,
दरिया-दिली,मानवता और बंधुता ये तो इन्सान होने का परिमाण है।
बेरहमों पर भी वक्त आने पर दरियादिली का असर छोड़ दो,
उस दिन वो पत्थर भी पिघलेगा,उसी दरियादिली को देखकर।
समन्दर की गहराई न पूछो,किसी भी दरिया दिल इन्सान को,
देख उस समन्दर की गहराईयों से बड़े होते है ऐसे नेक रहमतगार।

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