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लक्ष्मी आगमन | ऑनलाइन

©संतोष यादव

परिचय- मुंगेली, छत्तीसगढ़.


 

 

प्रत्येक घर में श्री (लक्ष्मी) का वास (निवास) होता है, लक्ष्मी माता के कई रूप है परन्तु हम उसे पहचानने में भूल करते हैं, या पहचान नहीं पाते हैं। जब नवविवाहित वधू गृह प्रवेश करती है तो लक्ष्मी के रूप में उनका स्वागत आरती करके, देहलीज (चौखट) पर कलश रखकर पैर से कलश को गिरा कर तथा कुमकुम वाले पराट, शिला या फर्श पर पदचिन्ह बनाते हुए गृह प्रवेश करती है यह संस्कार गृह प्रवेश संस्कार या लक्ष्मी संस्कार कहलाता है। उस समय वह साक्षात लक्ष्मी होती है। जिसके कारण स्त्रियों को गृह लक्ष्मी कहा जाता है। माता लक्ष्मी कई रूप में हमारे घर और आसपास होती है।

 

माता, बहन, बेटियां, बुआ, भाभी, वधू, पत्नी, प्रेमिका, दोस्त (सखी), दादी, चाची, नानी, मामी, मौसी, सहपाठी, सहकर्मी आदि। अर्थात् लक्ष्मी के विभिन्न रूप हैं, सभी स्त्रियां लक्ष्मी ही तो हैं। जब कोई स्त्री खाना परोसती हैं, उस समय साक्षात माता अन्नपूर्णा होती है, और जब हमारे प्रथम गुरु माता हमें शिक्षा देती है, तो वह साक्षात सरस्वती माता के रूप में होती है। हम अज्ञानी मानव लक्ष्मी माता को यहां – वहां सर्वत्र ढूंढते हैं, परंतु हमें लक्ष्मी कहीं नहीं मिलता है। क्योंकि हम लक्ष्मी माता के वास्तविक स्वरूप को नहीं देख पाते हैं। हमारे मन में अहंकार की पट्टी बंधी होती है, अज्ञानता का अंधकार मन में भरा होता हैं। और अहंकार, अज्ञानता के अंधकार में हम भला लक्ष्मी को कैसे पहचान ( देख) सकते हैं ?

 

प्रत्येक स्त्री, पुरुष, सजीव, निर्जीव लक्ष्मी का ही रूप (अंश) होती है, यह साधारण मानव समझ ही नहीं पाता है। स्त्रियां प्रकृति है। अपने मन से अहंकार, श्रेष्ठता की भावना, अज्ञानता, अंधकार को हटाकर तो देखो ? लक्ष्मी तो हमें सर्वत्र दिखाई देगी माता लक्ष्मी का निवास तो ब्रम्हांड के कण- कण में है। यहां तक सभी मनुष्यों, जीवों के शरीर में लक्ष्मी का वास होता है। कई पुरुषों को तो यह भी ज्ञान नहीं है, कि स्वयं पुरुष के शरीर का वाम (बायां) अंग स्त्री लिंग ( रूप) में है, स्त्री का है। पुरुषों के कई अंगों का नाम स्त्रीलिंग में है जैसे – आत्मा, आंख, भौंह, कलाई, अस्थि इत्यादि। अर्थात पुरुष भी स्त्री ही हैं। ठीक उसी प्रकार सभी स्त्रियों का दाहिना अंग पुरुष लिंग (रूप) में है, पुरुष का है। अर्थात् स्त्रियां भी पुरुष ही हैं। जैसे- हाथ, पैर, गर्दन, नाक, मुंह आदि के नाम पुरुष लिंग में है।

 

प्रत्येक मनुष्य या जीव प्रकृति (स्त्री) और पुरुष (आत्मा या परमात्मा ) के संयोग से निर्मित होता है। प्रत्येक मनुष्य, सजीव, निर्जीव आधा स्त्री है, आधा पुरुष अर्थात् अर्धनारीश्वर है। स्वयं देवों के देव महादेव आदि शिव – शंकर अर्धनारीश्वर है। स्त्री और पुरुष दो नहीं हैं, एक है। इसलिए स्त्री को अर्धांगिनी और पुरुषों का अर्धांग कहा जाता है।समाज में अर्धनारीश्वर का स्पष्ट (व्यक्त) रूप थर्ड जेंडर (तृतीय लिंग) हैं। कुछ घर में स्त्रियों को लोग हीन भावना से देखते हैं। घर के लक्ष्मियों के साथ कुछ लोग कितना बुरा व्यवहार, अत्याचार, अनाचार, शोषण, अन्याय, अनीति युक्त कार्य करते हैं। स्त्री और पुरुषों में भेदभाव करते हैं। बालक और बालिकाओं में भेदभाव करते हैं।

 

प्रतिदिन लक्ष्मियों को अपमानित करते रहते हैं। दुःख, कष्ट, पीड़ा देते रहते हैं। हम किसे अपमानित करते हैं ? किसे दुःख, कष्ट और पीड़ा देते हैं ? स्वयं अपने आप को ! परमात्मा को! फिर भला माता लक्ष्मी की कृपा उनके ऊपर कैसे हो सकती है ? बिकुल नहीं हो सकती है ! कहा भी गया है – “जिस घर में स्त्रियों की पूजा (सम्मान) होती है, उस घर में देवता निवास करतें हैं।” जिस घर की स्त्रियां दु:खी कष्ट, और पीड़ा में होती हैं उस घर के लोग कभी खुश नहीं रहते हैं, हमेशा समस्याओं में घिरे रहते हैं, और जिस घर की स्त्रियां सुखी होती है, खुश रहती है, सम्मानित होती हैं।

 

उस घर के लोगों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, कीर्ति, वैभव, ऐश्वर्य, धन – धान्य से परिवार भरपूर रहती हैं। स्त्रियां ही आदि शक्ति पार्वती, लक्ष्मी, काली, दुर्गा, सरस्वती है। अतः जिस किसी मनुष्य को माता लक्ष्मी की कृपा दृष्टि चाहिए, वह ब्रम्हांड की सारी स्त्रियों का आदर, सम्मान करें, उन्हें कष्ट, पीड़ा देना बंद कर दें। तभी माता लक्ष्मी प्रसन्न होगी, और घर, मन, शरीर, आत्मा में लक्ष्मी का वास (निवास )होगा। जिस घर, परिवार में माता लक्ष्मी का आदर, सम्मान होता है, माता लक्ष्मी हमेशा उस घर, परिवार में निवास करती है। तथा जिस घर, परिवार में माता लक्ष्मी का अनादर, अपमान होता है, उस स्थान को छोड़कर लक्ष्मी चली जाती है।

 

 

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