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सूनी बगिया देखकर, तितली है खामोश soonee bagiya dekhakar, titalee hai khaamosh

©डॉ. सत्यवान सौरभ

परिचय– हिसार, हरियाणा.


 

आज घरों के आस पास अब न पेड़ बचे हैं और न ही उनका कीटों से होने वाला भोजन। दिन भर दिन दूषित  होती वातावरण की आबोहवा, प्रदूषित भोजन व गायब होते कीटों से पक्षियों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हम में से पक्षियों की कमी तो सबने महसूस की होगी, लेकिन उनको बचाने बहुत कम लोग ही आगे आए हैं। पक्षियों पर आफत के लिए पेड़ों की घटती संख्या से भोजन के लिए संकट, खेतों में कीट नाशक दवाओं का प्रयोग, घरों में गौरैया के रहने के लिए कोई जगह नहीं जैसे कारण है।

 

बढ़ते शहरीकरण के कारण धरती पर जंगल कम क्या हुए इंसान ही नहीं पक्षी भी सिमटने लगे। आज हम सभी आधुनिकता की चकाचौंध में हम बंद कमरों में सिमट कर रह गए। लेकिन पेड़ पौधों के संरक्षण और नए पौधों को भूल गए। हम सबने ये अनुभव किया है कि हरियाली मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु पक्षियों को भी जीने की राह सिखाती है। आज दुनिया भर में बढ़ती आबादी और शहरीकरण के विस्तार से पेड़ों की संख्या लगातार कम हो रही है। खासकर इससे गौरैया व तोता जैसे पक्षियों के जीवन पर संकट मंडराने लगा है।

 

एक जमाना था जब सुबह पक्षियों की चहचाहट से होती थी। लेकिन अब धीरे-धीरे गौरेया जैसी घर के आँगन कि शान बढ़ाने वाली प्रजाती लुप्त होने की कगार पर है। इसका बड़ा कारण ये है कि आज घरों के आस पास अब न पेड़ बचे हैं और न ही उनका कीटों से होने वाला भोजन। दिन भर दिन दूषित  होती वातावरण की आबोहवा, प्रदूषित भोजन व गायब होते कीटों से पक्षियों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हम में से पक्षियों की कमी तो सबने महसूस की होगी, लेकिन उनको बचाने बहुत कम लोग ही आगे आए हैं।

 

आज घटते जंगलों से पक्षियों का जीवन अस्त-व्यस्त होने लगा है। आये दिन उनकी संख्या में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। समस्या यहाँ तक पहुँच गयी कि पेड़ों की घटती संख्या से पक्षियों को घरौंदे बनाने के लिए जगह तक नसीब नहीं हो पा रही है। मजबूरन बेचारे पक्षी अपने घोंसले कहीं बिजली के खंभों पर उलझे तारों में बना रहे हैं, तो कहीं रोड़ लाइटों पर।  गौर से देखे तो कभी हमारे घर-आंगन में दिखने वाली गौरैया आजकल दिखाई नहीं देती। भोजन की कमी होने, घोंसलों के लिए उचित जगह न मिलने तथा माइक्रोवेव प्रदूषण जैसे कारण उनकी घटती संख्या के लिए जिम्मेदार हैं। शुरुआती पंद्रह दिनों में गौरैया के बच्चों का भोजन कीट-पतंग होते हैं। पर आजकल हमारे बगीचों में विदेशी पौधे ज्यादा लगाते हैं, जो कीट-पतंगों को आकर्षित नहीं कर पाते।

 

गौरैये के अलावा तोते पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। दुनिया में तोते की लगभग 330 प्रजातियां ज्ञात हैं। पर अगले सौ वर्षों में इनमें से एक तिहाई प्रजातियों के विलुप्त होने की आशंका है। पक्षियों पर आफत के लिए पेड़ों की घटती संख्या से भोजन के लिए संकट, खेतों में कीट नाशक दवाओं का प्रयोग, घरों में गौरैया के रहने के लिए कोई जगह नहीं जैसे कारण है। गौरैया की आबादी में गिरावट के कारणों में तेजी से शहरीकरण, जीविका के लिए घटते पारिस्थितिकी संसाधनों, प्रदूषण के उच्च स्तर और माइक्रोवेव टावरों से उत्सर्जन के कारण निवास स्थान का नुकसान है।

 

देखे तो सभी घरों में वेंटिलेटर की जगह एसी और पेड़ों ने सजावटी पौधों और पार्कों में सजावटी फूलों की झाड़ियों से बदल दिया है, जिससे पक्षियों के लिए घोंसला बनाना असंभव हो गया है, आजकल महिलाएं न तो धान सुखाती है, ताकि कुछ खाने को मिल सके। भारत समेत संपूर्ण विश्व की जैव विविधता जिस तेजी से घट रही है, वह दुखद तो है, लेकिन आश्चर्यजनक कतई नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य द्वारा किए गए प्राकृतिक दोहन का नतीजा यह है कि बीते चालीस वर्षों में पशु-पक्षियों की संख्या घटकर एक तिहाई रह गई है। पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियां तो विलुप्ति के कगार पर हैं। फिर भी हम अपनी जीवन-शैली बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।

 

पुराने लोग बताते हैं, गाँवों के आस -पास का  इलाका कभी वन यानी अनगिनत पेड़-पौधों से आच्छादित था। आज उन्ही क्षेत्र में कंक्रीट के जंगल ने पेड़-पौधों की जगह ले ली है। दरअसल, मकान बनाना हो या सड़क, अंधाधुंध रफ्तार से पेड़ काटे जा रहे हैं। हालांकि, पेड़ काटने के नियम हैं और आवासीय इलाकों में चालीस प्रतिशत क्षेत्र पेड़-पौधों के लिए छोड़ा जाना चाहिये। लेकिन, पर्यावरण संरक्षण के ये नियम केवल कागजी हैं। लोग सोचते हैं एक पेड़ कट जाने से भला पर्यावरण पर कौन सी आफत आ जायेगी। जबकि, विभाग पुराने पेड़ बचाने की बजाय नये लगाने की योजनाओं पर ज्यादा जोर देता है।

 

इन दिनों ग्लोबल-वार्मिंग की समस्या से जूझ रही दुनिया के लिये पर्यावरण असंतुलन खतरा बन गया है। अंधाधुंध काटे जा रहे वृक्षों से सिमट रहे जंगल इसका प्रमुख कारण है। फिर भी कोई चेतने को तैयार नहीं हैं। लिहाजा बढ़ती आबादी के कारण न केवल हरियाली गुम हो रही है, बल्कि सांस लेने के अनुकूल वायु व पीने को शुद्ध जल भी नसीब नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं कि पर्यावरण संतुलन के लिए सरकारी योजनाएं नहीं हैं। इसको लेकर तमाम योजनाएं बनी हैं, बावजूद इसके हमारी धरती सूनी ही है।

 

बाग-बगीचों की जगह कंक्रीट के जंगल फ़ैल गए है; बढ़ती आबादी व आर्थिक कारणों से पेड़ धड़ाधड़ काटे जा रहे हैं। जिसके स्थान पर कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है। जिससे शहरों की कौन कहे देहात की आबोहवा भी प्रभावित होने लगी है। पॉलिथीन इस्तेमाल की पाबंदी भी बेमतलब साबित हो रही है। जिससे जल, जंगल व जमीन तीनों का चेहरा फीका हो गया है। पर्यावरण असंतुलन को बढ़ावा देने में कई तरह के कारक शामिल हैं। इसका अहसास भी हो रहा है। बावजूद इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता है, जिससे सरकारी या गैर सरकारी सभी योजनाएं अथवा अभियान फाइलों तक सिमट कर रह जाता है।

 

रातो-रात धनवान बनने की चाहत और सुविधा का उपभोग करने की ललक में न केवल पेड़ों की कटाई हो रही है बल्कि काटे गये पेड़ की जगह दूसरा पौधा लगाने की फिक्र भी नहीं है। अपनी भूमि नहीं होने के कारण नहर, आहर व तालाब के किनारे पेड़ लगाये जाते हैं। सरकारी स्तर पर वृक्षारोपण में स्थानीय लोगों का जुड़ाव नहीं हो पाता। एजेंसियां पेड़ लगा कर चली जाती हैं और बाद में उसमें कोई पानी देने वाला भी नहीं रहता। जिसमें कितने सूखे तथा कितने अभी जिंदा हैं यह बताना मुश्किल होता है।

 

दरअसल हमारे यहां सरकार और अन्य संस्थाओं के द्वारा बड़े जीवों के संरक्षण पर तो ध्यान दिया जाता है, पर पक्षियों के संरक्षण पर उतना ध्यान ही नहीं। हम सब के द्वारा वृक्षारोपण, जैविक खेती को बढ़ाकर तथा माइक्रोवेव प्रदूषण पर अंकुश लगाकर पक्षियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। अगर अब भी यदि हम जैव विविधता को बचाने का सामूहिक प्रयास न करें, तो बहुत देर हो जाएगी और सूनी बगिया देखकर, तितली खामोश हो जाएगी, जुगनूं की बारात से, जोश गायब हो जायेगा।

 

 

डॉ. सत्यवान सौरभ

Dr Satywan Saurabh

 

 

Seeing the deserted garden, the butterfly is silent

 

 

Today there are neither trees left around the houses nor their food from insects. Due to the polluted environment, polluted food and disappearing insects, the clouds of crisis have started hovering over the birds. All of us must have felt the lack of birds, but very few people have come forward to save them. There are reasons for the disaster on birds like food crisis due to the decreasing number of trees, use of insecticides in the fields, there is no place for sparrows to live in the houses.

 

Due to the increasing urbanization, the forests on the earth decreased, not only humans but also birds started shrinking. Today we are all confined in closed rooms in the glare of modernity. But trees forgot the protection of plants and new plants. We all have experienced that greenery not only teaches humans but also animals and birds how to live. Today the number of trees is continuously decreasing due to increasing population and expansion of urbanization around the world. Especially due to this, the life of birds like sparrow and parrot has started facing danger.

 

There was a time when the morning was accompanied by the chirping of birds. But now gradually the species that enhance the beauty of the courtyard of the house like sparrow is on the verge of extinction. The big reason for this is that today there are no trees left around the houses, nor their food from insects. Due to the polluted environment, polluted food and disappearing insects, the clouds of crisis have started hovering over the birds. All of us must have felt the lack of birds, but very few people have come forward to save them.

 

Today the life of birds has started getting disturbed due to depleting forests. Day by day there is a steady decline in their numbers. The problem has reached to such an extent that due to the decreasing number of trees, the birds are not getting enough space to make their homes. Forcing the poor birds are making their nests somewhere in the tangled wires on the electric poles, and somewhere on the street lights. If you look closely, the sparrow that was once seen in our house and courtyard is not visible nowadays. Reasons such as lack of food, lack of proper nesting space and microwave pollution are responsible for their declining numbers. In the first fifteen days, the food of the children of sparrows is insects and mites. But nowadays we plant more exotic plants in our gardens, which are unable to attract insects and moths.

 

Apart from sparrows, the clouds of trouble are also hovering over the parrots. About 330 species of parrots are known in the world. But in the next hundred years, a third of these species are expected to become extinct. There are reasons for the disaster on birds like food crisis due to the decreasing number of trees, use of insecticides in the fields, there is no place for sparrows to live in the houses. The reasons for the decline in sparrow population are habitat loss due to rapid urbanization, dwindling ecological resources for sustenance, high levels of pollution and emissions from microwave towers.

 

Ventilators in all homes have been replaced by ACs and trees have been replaced by ornamental plants and ornamental flowering shrubs in parks, making it impossible for birds to nest, nowadays women neither dry the paddy, so that there is something to eat Can you The rate at which the biodiversity of the whole world, including India, is declining, is sad, but not surprising at all. The result of the natural exploitation done by man for his selfishness is that in the last forty years the number of animals and birds has come down to one third. Many species of plants are on the verge of extinction. Yet we are not ready to change our lifestyle.

 

The old people tell that the area around the villages was once covered with forest i.e. innumerable trees and plants. Today in the same area the concrete forest has taken the place of trees and plants. Actually, be it building a house or a road, trees are being cut at indiscriminate speed. However, there are rules for cutting trees and in residential areas forty percent of the area should be left for trees. But, these rules of environmental protection are only on paper. People think that if a tree is cut down, what calamity will come on the environment. Whereas, instead of saving old trees, the department lays more emphasis on the plans to plant new ones.

 

These days, environmental imbalance has become a threat to the world battling with the problem of global-warming. The main reason for this is the forests that are shrinking from the trees being cut indiscriminately. Still no one is ready to conscious. Therefore, due to the increasing population, not only the greenery is getting lost, but the air to breathe and the pure water to drink is also not being available. It is not that there are no government schemes to balance the environment. Many plans have been made regarding this, yet our earth remains deserted.

 

Concrete forests have spread in place of gardens; Trees are being cut indiscriminately due to increasing population and economic reasons. In its place, a concrete jungle is spreading. Due to which the climate of the countryside has also started getting affected. The ban on the use of polythene is also proving to be meaningless. Due to which the face of water, forest and land has become pale. A variety of factors are involved in promoting environmental imbalance. It is also being felt. Despite this, it is not taken seriously, due to which all government or non-government schemes or campaigns remain confined to files.

 

In the desire to become rich overnight and to enjoy the convenience, not only the trees are being cut, but there is no concern about planting another tree in place of the cut tree. Due to lack of land, trees are planted on the banks of canals, ahars and ponds. There is no involvement of the local people in the plantation at the government level. Agencies leave after planting trees and later there is no one to give water. In which it is difficult to tell how many are dry and how many are still alive.

 

In fact, in our government and other institutions, attention is paid to the conservation of large animals, but not so much attention is paid to the protection of birds. All of us can save birds from extinction by planting trees, increasing organic farming and curbing microwave pollution. If even now if we do not make collective efforts to save biodiversity, then it will be too late and seeing the deserted garden, the butterfly will be silent, from the procession of fireflies, the enthusiasm will disappear.

 

 

 

 

 

 

 

 

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