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गुरु; गुरु देवो भवः | ऑनलाइन बुलेटिन

©संतोष यादव

परिचय- मुंगेली, छत्तीसगढ़.


 

भारत में विश्व के सबसे प्राचीन धर्म है जिसे सनातन धर्म कहते हैं। सृष्टि के आरंभ से ही भारत गुरुओं का देश रहा है, इसी कारण भारत विश्व गुरु कहलाता है। प्राचीनकाल में गुरु आश्रम में रहते थे, बच्चे उपनयन संस्कार के बाद आश्रम में प्रवेश करता था और शिक्षा – दीक्षा पूर्ण होने पर आश्रम से वापस आकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था।

 

शिष्य भी आश्रम में गुरु के साथ रहते थे वह (शिष्य) गुरु की आज्ञा से आश्रम में सारे घरेलू कार्य जैसे- झाड़ू लगाना, पशुओं के लिए चारा लाना व देखभाल करना, पानी भरना, खाने के लिए दोना – पत्तल इकट्ठा करता था, चटाई बनाता था। लकड़ी लाना, भिक्षा मांगना, नए आश्रम के निर्माण में अपनी भूमिका निभाता था। यहां तक अपने गुरु तथा गुरु माता का सेवा भी करता था।

 

“गुरु: ब्रह्मा: गुरु: विष्णु: गुरु: देवो महेश्वर:, गुरु: साक्षात् परब्रह्म: तस्मै गुरुवे नमः।” अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही महेश्वर (शंकर) है, गुरु साक्षात् (प्रगट रूप में स्वयं) परब्रह्म है, ऐसे गुरुओं को मैं प्रणाम करता हूं। प्रत्येक मनुष्य या जीव को गुरु की प्राप्ति होती है गुरु के माध्यम से ही वह सारे संसार से परिचित होता है बड़े – बड़े महान् ऋषि – मुनियों, भगवान (परमात्मा) का गुरु होता है।

 

ब्रह्मांड का सबसे बड़ा गुरु आदिगुरु आदिश्री शिव – शंकर है वह गुरुओं के गुरु महागुरु है। यहां कुछ प्रमुख देवी- देवताओं, ऋषियों, संतों और उनके गुरुओं का वर्णन किया जा रहा है-

 

  • (1) हरि विष्णु – आदि शिव – शंकर।
  • (2) ब्रह्मा – आदि शिव – शंकर।
  • (3) शनिदेव – शिव।
  • (4) परशुराम – महादेव (शिव)।
  • (5) राम – महर्षि वशिष्ठ।
  • (6) हनुमान – सूर्य देव।
  • (7) कृष्ण – महर्षि संदीपिनी
  • (8) महामानव महात्मा गौतम बुद्ध – अलार कलाम एवम रुद्रक।
  • (9) शंकराचार्य – गोविंदपाद।
  • (10) स्वामी विवेकानंद – रामकृष्ण परमहंस।
  • (11) गुरु घासीदास – जगजीवनराम। देव गुरु बृहस्पति और दैत्य गुरु शुक्राचार्य हैं।

 

अर्थात् प्रत्येक देवी – देवताओं, दैत्यों, ऋषि – मुनियों, मनुष्यों, प्राणियों का गुरु होता ही है। बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं है। गुरु का अर्थ – गुरु शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है गु + रु = गु का अर्थ अंधकार (अज्ञान) होता है, और रु का अर्थ (मिटाने वाला अर्थात् प्रकाश) अतः गुरु वह है जो हमें अंधकार (अज्ञानता) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाए हमारे मन, बुद्धि, आत्मा के अंधकार को दूर कर प्रकाशित कर दे। गुरु स्वयं प्रकाश (ज्ञान) है।

 

प्रत्येक मनुष्य के जीवनकाल में अनेक गुरु होते हैं परंतु उनमें से पांच गुरु मुख्य होते हैं –

 

(1) जननी (माता) – प्रत्येक मनुष्य या जीवों का प्रथम गुरु हमारे माता ही होती है, वह हमें हंसना, बोलना, चलना, पढ़ना, लिखना, जीवन की कठनाइयों का सामना करना, हमारे भय, दुःख, पीड़ा को दूर करती है। हमारे सारे समस्याओं का इलाज (हल) हमारे माता के पास होती है। माता स्वयं साक्षात् भगवान का रूप होती है। मनुष्य या जीवों के लिए माता ही परब्रह्म है।

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माता जननी बनकर हमें जन्म देती है, माता सरस्वती के रूप में हमें ज्ञान देती है, माता अन्नपूर्णा (लक्ष्मी) के रूप में हमें भोजन देती है। रक्षक (सैनिक) बनकर हमारी सुरक्षा करती है। माता प्रथम गुरु है, जो परब्रह्मा से भी बढ़कर है। माता डॉक्टर (वैद्य) है, साथी बनकर हमारे साथ खेलती है, स्वयं हारकर हमें जिताती है, स्वयं कष्ट पीड़ा सहकर हमें सारे सुख देती है। माता हमारे लालन – पालन करती है। माता को भूमि कह जाता है, जिस प्रकार धरती माता का हमारे जीवन में हमें अपना सब कुछ दे देती है उसी प्रकार माता हमारे ऊपर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है।

 

कुछ समाज में मातृ सत्तात्मक परिवार पाया जाता है, माता ही परिवार का मुखिया, पालक, संरक्षक का कार्य करती हैं।

 

(2) पिता – पिता मनुष्य या प्राणियों का द्वितीय गुरु होता है। पिता भी, बोलने, चलने, पढ़ने, लिखने, नैतिक शिक्षा, संस्कार, भरण पोषण आदि कार्य, करता है। प्रायः पिता पूरे परिवार का पालक होता है पिता को परिवार का पालनहार कहा जाता है, पिता मुख्य संरक्षक होता है, पूरे परिवार का संरक्षण करता है।

 

यह ब्रह्मांड पुरुष प्रधान (पितृ सत्तात्मक) समाज है, पिता परिवार का मुखिया होता है, पिता ही बालक की उदंडता के लिए दंड और अच्छे कार्य के लिए पुरस्कार देने का कार्य करता है, पिता पूरे परिवार का केंद्र बिंदु है, परिवार रूपी वृक्ष का जड़ है, पिता परिवार के लिए न्यायधीश, दंडाधिकारी के रूप में कार्य करता है। शास्त्रों में पिता को आकाश कहा गया है। जिस प्रकार आकाश छाया, पानी देता है, हमें ढककर रखता है, सारे धूल धुंआ को अपनी में विलीन कर देता है। उसी प्रकार पिता बच्चों के लिए कार्य करता है।

 

(3) गुरु(शिक्षक) – प्राचीन काल में शैक्षणिक और आध्यात्मिक गुरु एक ही होता था परंतु अब दोनों गुरु अलग अलग होता है। शिक्षक को गुरुजी, अध्यापक, आचार्य, उपाध्याय आदि कई नामों से जाना जाता है। वर्तमान समय में शिक्षक शैक्षणिक और नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, योगशिक्षा, व्यायाम, खेलकूद, संगीत, नृत्य, क्राफ्ट, चित्रकला, पेंटिग, रंगोली आदि कार्य करता है।

 

शासकीय विद्यालय प्राथमिक और माध्यमिक तथा हाई स्कूल स्तर पर यह सारे शिक्षण, प्रशिक्षण का कार्य एक ही शिक्षक के द्वारा किया जाता है, हायर सेकंडरी स्तर पर अलग – अलग शिक्षक होते हैं। शिक्षक ही प्रायः अधिकांश बच्चों को अक्षर ज्ञान करता है, शिक्षक मुख्य रूप से किसी ज्ञान या अक्षर को सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना, और समझना सिखाता है।

 

शिक्षक विद्यालय में मुख्य रूप से निम्नलिखित भूमिका निभाता है-

 

(1) शिक्षक गुरु के रूप में – शिक्षा, नैतिक शिक्षा, व्यवहारिक शिक्षा, योग, व्यायाम, खेलकूद, पीटी, नृत्य, संगीत, चित्रकला, क्राफ्टकला, पेंटिग, रंगोली, कढ़ाई, बुनाई, कृषि कार्य जैसे – फूल लगाना, सब्जी लगाना, पेड़ – पौधे लगाने का शिक्षण और प्रशिक्षण और अन्य अनेक विधा में शिक्षण, प्रशिक्षण देने का कार्य करता है।

 

(2) शिक्षक माता के रूप में – जिस शिक्षक में ममता का गुण न हो वह शिक्षक प्रायः अच्छा शिक्षक नहीं होता है, शिक्षक माता बनकर बच्चों को प्यार, पुरस्कार, प्रेरणा, बच्चों की छोटी – छोटी गलतियों को क्षमा करना, प्रत्येक बच्चों को आगे बढ़ने का बार – बार अवसर देने का कार्य करता है। जैसे माता अपने पुत्र या पुत्रियों के साथ दोस्त बनकर खेल खेलता है वैसे ही शिक्षक भी छात्रों के साथ खेल खेलता है। अंग्रेजी में एक कहावत है -” MOTHER IS OUR FIRST TEACHER AND THE TECHAR IS OUR SECOND MOTHER .” अर्थात् माता हमारे प्रथम शिक्षक (गुरु) है और शिक्षक(गुरु) हमारे द्वितीय माता है। शिक्षक माता बनकर बच्चों को मध्यान्ह भोजन खिलाता है।

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(3) शिक्षक पिता के रूप में- शिक्षक पिता बनकर हमारे असामान्य व्यवहार को नियंत्रित करता है, अनुशासन बनाने का प्रयास करता है। यदि बच्चें ज्यादा उदंडता करते थे तो उसे लघु दंड दिया जाता था। दंड का अर्थ सजा नहीं है दंड का मूल अर्थ सुधार है। यह दंड उनके आचरण में सुधार के लिए दिया जाता था। ताकि बच्चें सही मार्ग या कार्य पर लौट आए। परंतु वर्तमान समय में बच्चों को किसी प्रकार का शारीरिक, मानसिक, आर्थिक दंड नहीं दिया जा सकता है। सरकार के द्वारा गुरु के पिता की भूमिका में अंशत: कटौती की गई है।

 

(4) शिक्षक संरक्षक के रूप में – विद्यालय समय में शिक्षक बच्चों के सुरक्षा का भी दायित्व निभाता है। बच्चें एक दूसरे से आपस में न झगड़े, बाहरी लोग बच्चों को किसी प्रकार क्षति न पहुंचाए यह भी ध्यान रखा जाता है। विद्यालय में बरसात, गर्मी के दिनों में सांप, बिच्छू आए दिन निकलते रहता है शिक्षक इनसे रक्षा करता है।

 

(5) शिक्षक चिकित्सक के रूप में- शिक्षक डॉक्टर के रूप में बच्चों को स्वास्थ्य ठीक रखने के तरीके बताता है,संतुलित भोजन का टिप्स बतात है। साफ – सफाई एवम स्वच्छता की जानकारी देता है। किसी बच्चे को चक्कर आने पर, चोट लगने पर उसका प्राथमिक उपचार करता है, कृमि का गोली खिलाता है, आयरन एवम फोलिक एसिड का गोली खिलाता है। हाईट मापता है, वजन तौलता है, टीका लगवाने में मदद करता है।

 

(6) शिक्षक पुलिस और न्यायधीश के रूप में – किसी बच्चे का कोई सामान चोरी हो जाता है तो शिक्षक पुलिस बनकर पता लगाने का प्रयास करता है, और पता लगने पर बच्चों को नैतिक शिक्षा के माध्यम से न्यायधीश बनकर समझाने का प्रयास करता है। या चोरी करने वालों के लिए हमारे कानून व्यवस्था में क्या दंड का प्रावधान है यह बताता है। उसके आचरण को सुधारने का प्रयास करता है। यदि दो बच्चों के बीच किसी बात को लेकर कोई झगड़ा होता है तब शिक्षक न्यायधीश बनकर उस झगड़े को सुलझाने का प्रयास करता है। शिक्षक दोनों पक्षों की बातों को निष्पक्ष भावना से सुनता है। फिर यदि कोई गवाह है तो उसकी गवाही ली जाती है। तथा कोई सबूत है तो उस सबूत का जांच किया जाता है। तब फिर आपसी समझौता करवाता है।साथ ही साथ नैतिक शिक्षा के द्वारा बच्चों को उचित मार्ग पर लाने का कार्य करता है।

 

(7) शिक्षक मार्गदर्शक एवम केरियर काउंसलर के रूप में – जो विद्यार्थी शिक्षक को अपना आदर्श, प्रेरणा स्रोत मानते हैं, शिक्षक और ज्ञान के प्रति समर्पण भावना रखते हैं। वे शिक्षक से जीवन भर के लिए प्रेरणा लेते हैं, उस विद्यार्थी के अंदर स्वयं उस शिक्षक का गुण आ जाता है जिस शिक्षक को वह अपना गुरु, आदर्श, प्रेरणा स्रोत मानता है। प्रत्येक शिक्षक अपने शिष्यों को, समाज को हमेशा प्रेरणा व मार्गदर्शन देते हैं। शिक्षक द्वारा ही छात्रों को नौकरी, रोजगार, स्वरोजगार, व्यापार, कृषि, सेवा (बैंक, बीमा, प्रशासन) की जानकारी दिया जाता है।

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इसीलिए विद्यार्थियों से पूछा जाता है कि आप क्या बनना (करना) चाहते हो। विद्यार्थी शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, कलेक्टर, तहसीलदार, एसडीएम, सीईओ, डीईओ, बीईओ, पुलिस, सैनिक, खिलाड़ी, पेंटर, सचिव, प्रशासनिक अधिकारी आदि बनने की इच्छा जाहिर करतें हैं और शिक्षक बच्चों के उनकी रुचि के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता है। विद्यार्थियों को उनकी मंजिल(लक्ष्य) तक पहुंचता है इसलिए कहावत है –

 

(1) शिक्षक वह सड़क है जो स्वयं एक ही स्थान पर स्थिर रहता है, परंतु लाखों यात्रियों (विद्यार्थियों) को उनकी मंजिल (लक्ष्य) तक पहुंचा देता है।

 

(2) दूसरा कहावत है -“ शिक्षक जीवन भर दीपक की तरह स्वयं जलते रहता है, और हमेशा दूसरों को रोशनी (प्रकाश) देता है।

 

(3) आध्यात्मिक गुरु- आध्यात्मिक गुरु वह है जो हमें धर्म का ज्ञान देता है,जो हमें सद्कर्म के लिए प्रेरित करता है, चरित्रवान बनाता है। हमें दीक्षा देता है, गुरु मंत्र देता है, और परमात्मा का साक्षात्कार(दर्शन) करवाता है। हमें योग, ध्यान, तप, दान, पूजा, यज्ञ करना सिखाता है।

 

(4) परब्रह्म – परब्रह्म हमारे पांचवा गुरु होते हुए प्रथम गुरु है परब्रह्म गुरुओं के गुरु महागुरु है, आदि गुरु है सत्य है, नित्य है, पुरातन है, सनातन है। ब्रह्मांड के प्रथम गुरु आदिगुरु शिवशंकर है वही परब्रह्म है, शिवजी ही प्रथम गुरु, गुरुओं के गुरु महागुरु है। इसे अनेक नामों से जाना जाता है। प्रतिदिन ध्यान, पूजा, अर्चना, यज्ञ आदि कार्य कर अर्थात् ज्ञान (ब्रह्मज्ञान या आत्मज्ञान, कर्म (निष्काम कर्म), और भक्ति (अद्वैत भक्ति) से परब्रह्म का साक्षात्कार (दर्शन) करते हैं।

 

इसी कारण गुरु की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कबीर दास ने कह है- ” गुरु गोविंद दोऊ खड़े काको लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने जो गोविंद दियो बताए।” इस दोहा में कबीर दास ने गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु को अपने से श्रेष्ठ कहा है। क्योंकि गुरु के ज्ञान के माध्यम से ही हम परमात्मा तक पहुंचते हैं, इसलिए मनुष्य या जीवों के लिए गुरु भगवान से भी अति उत्तम है।

 

माता, पिता, गुरु (शिक्षक), आध्यात्मिक गुरु, परब्रह्म ये सभी मानव जीवन के लिए पांच वेद के समान हैं (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, मद्भागवतगीता (इसे पंचम वेद कहा जाता है)। गुरु के कार्य, उपकार, महिमा अनंत है, जिसका वर्णन जितना भी किया जाए उतना कम है, उसे शब्दों से वर्णन करना असम्भव है। गुरु के कार्य उपकार, महिमा शब्द, ज्ञान, बुद्धि से परे है।

 

 

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी और मौलिक हैं)

 

 

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