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चीतों पर बड़ा प्यार आता है | ऑनलाइन बुलेटिन

के. विक्रम राव

©के. विक्रम राव, नई दिल्ली

-लेखक इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।


 

क्या मंजर है ! आज बहत्तर वसंत देख चुके चौदहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर सात दशकों बाद आक्रामक जंतु चीता को भारत में पुनः बसा दिया। जुनून के साथ। वक्त भी उनका, जमीं भी उन्हीं की। बड़ा प्रतीकात्मक है। ठीक जैसे पुलवामा का बदला लिया। बालाकोट पर बमबारी द्वारा। मोदी गीर जंगलों की भूमि से है। रफ्तार चीते जैसी, शासन में, समाज में भी। चुनाव में भी। वर्ना जिनके दिल चूजे के होते है, उनके पैर कम से कम चीते जैसे होने चाहिये। जल्दी भाग सके। समरकंद से सीधे कुनो अभयारण्य आकर मोदी ने तैमूर के साम्राज्य मंे चीन-पाकिस्तान की जुगलबंदी देखी। तो राजपुताना की धरती पर पहुंचकर शौर्य भी देखा। उनके वंशजों को भी आगाह कर दिया कि वे पाकिस्तान और चीन से सामना करने के लिये तैयार रहें। उन दोनों के नेता थे समरकन्द में।

 

मगर याद आता है इसी कालखण्ड का दूसरा नजारा। साठ साल बीते। प्रथम प्रधानमंत्री केवल पक्षी-प्रेमी थे, पशुओं में श्वान उनका सर्वाधिक प्रिय था। जो सदैव आज्ञाकारी ही रहता है। वे, जवाहरलाल नेहरू, सफेद कबूतर उड़ाते थे। धवल कपोत अमन की अलामत होते है। मगर इस प्रशांतता का फल क्या देश ने पाया ? चीन ने अड़तीस हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हथिया ली। शांति का नोबल पारितोष पाने की हसरत लिये नेहरू चल बसे।

 

फिलवक्त चीते की वापसी ही आज एक मात्र विषय है। धरती पर सर्वाधिक तेज दौड़ने वाले (सौ किमी प्रति घंटा), स्पोर्ट्स सुपरकार से भी ज्यादा गतिवाला, यह चौपाया पतली टांगों, हल्का वजन (72 किलो), लंबी पूंछ, गोल सिर, सुराही जैसी ग्रीवा, बदन पर काली पीली लकीरें, आंसुनुमा नयन जो हृदय को द्रवित कर देते हैं। शर्मीली आंखें जो दूरबीन से भी (पांच किमी से भी) दूर देख सकती हैं। बस बीस से साठ क्षणों में शिकार कब्जिया ले। अपने किस्म का अनूठा है यह। एक मायने में आदमजात से बेहतर दंपति होता है चीता युगल! अभिसार की बेला पर दोनों हकलाते है। यह आपसी रूचि का सूचक होता है। प्रजनन के पश्चात मादा तो एकांत प्रेमी हो जाती है। नर चीता संतति से लगा रहता है उनकी देखभाल में जुटा रहता है। चीता दहाड़ नहीं सकता। बस घुर घुराता है। वजह है कि उसकी स्वरतंत्रियां महीन होती हैं। वाकतंतु अशक्त। शिकार करते समय गला धीमी हो जाता है। मगर दौड़ वैसी ही द्रुत रहती है। सिर्फ तीन क्षणों में रफ्तार पकड़ लेती है। शायद ही कोई पकड़ में न आये।

 

चीता जब भारत में हुआ करता था तब वह असली राष्ट्रव्यापी था। पंजाब के वनों से तिरूनलवेलि (तमिलनाडु) तक फैला हुआ था। इतना भूभाग क्योंकि इस परजीवी का मनपसंद आहार जंगल के चारागाह, हरित घासवाला भूभाग पर चर रहे चीतल, हिरन, खरगोश आदि से लबरेज क्षेत्र रहा।

 

मगर चीते के कट्टर शत्रु भी कई हैं। मसलन तेन्दुआ। बाघ भी। वह चीते पर भारी पड़ता है। कुनो (मध्य प्रदेश) अभयारण्य में तेन्दुये बेहद है। इसीलिये चीते के अस्तित्व पर ही संकट है। कुनो वन के निकट मन्दसौर के गांधी सागर वनजीव क्षेत्र में इन चीतांे को दूसरे अभयारण्य की आवश्यकता होगी। मगर बाघ तथा तेंदुआ स्वभूमि छोड़ेंगे नहीं। उन्हें चंबल घाटी बड़ी प्रिय है। दस्युओं की भांति। तो योजना बनानी होगी।

 

एक अजूबा है। चीते के पंजे कमजोर होते है। वे उन्हें मोड़ नहीं सकते। बन्द नहीं कर सकते। पकड़ ढीली हो जाती है। शिकार बहुधा छूट जाता है। अपनी मौसी बिडाल की भांति चीता पेड़ पर चढ़ भी नहीं पाता।

 

कैसी त्रासदी है कि सवा सौ साल पूर्व भारत में एक लाख चीते होते थे। बादशाह अकबर के पास एक हजार थे। सन 1952 में आखिरी तीन चीते भी आखेटकों की लिप्सा के शिकार बन गये थे। सारगुजा के एक सामंत थे जिन्होंने देश के अंतिम तीन चीतों को मार गिराया। उस समय चीते 1360 थे जिन्हें ‘‘प्रोजेक्ट टाइगर‘‘ के कारण शेर तो बचाया गया। आज वे करीब तीन हजार हैं। दक्षिणी अफ्रीका के नामीबिया गणराज्य जो जर्मन साम्राज्यवाद का उपनिवेश था विश्व के श्रेष्टतम वन पशुओं का पनाहगार है।

 

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