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हम अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं, इसीलिये हिन्दू नहीं कहलाए जा सकते | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय-   गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


 

नुसूचित जाति” का अर्थ; जाति का मतलब तो सबको पता है। परन्तु ‘अनुसूचित’ का मतलब सभी को शायद पता नहीं है ? इसके लिये आगे पढ़िए…

 

सन् 1931 में उस समय के जनगणना आयुक्त जे. एच. हटन ने पहली संपूर्ण भारत की अस्पृश्य जातियों की जनगणना करवाई और बताया कि ‘भारत में 1108 अस्पृश्य जातियां है। वें सभी जातियां हिन्दू धर्म के बाहर हैं। इसलिए इन जातियों को “बहिष्कृत जाति” कहा गया है।

 

उस समय के प्रधानमंत्री “रैम्से मैक्डोनाल्ड” ने देखा कि हिन्दू, मुसलमान, सिख, एंग्लो इंडियन की तरह ‘बहिष्कृत जातियां’ भी एक स्वतंत्र वर्ग है। ये सभी जातियां हिन्दू धर्म में समाविष्ट नहीं है। इसलिए, उनकी “एक “सूची” तैयार की गयी।

 

उस “सूची” में समाविष्ट समस्त जातियों को ही ‘अनुसूचित जाति’ कहा जाता है।

 

इसी के आधार पर भारत सरकार द्वारा ‘अनुसूचित जाति अध्यादेश 1935 ’ के अनुसार कुछ सुविधाएं दी गई हैं। उसी आधार पर भारत सरकार ने ‘अनुसूचित जाति अध्यादेश 1936 ’ जारी कर आरक्षण सुविधा का प्रावधान किया।

 

आगे 1936 के उसी अनुसूचित जाति अध्यादेश में थोड़ा बहुत बदलाव कर अनुसूचित जाति अध्यादेश 1950 पारित कर “आरक्षण” का प्रावधान किया गया।

 

 “निष्कर्ष”

 

अनुसूचित जाति का इतिहास यही कहता है कि यह भारत वर्ष में 1931 की जनगणना के पहले की अस्पृश्य, बहिष्कृत जातियां हिन्दू धर्म से बाहर थीं और इन्हीं सभी बहिष्कृत जातियों की “सूची” तैयार की गई। उन्हीं (अस्पृश्य, बहिष्कृत, हिन्दू से बाहर) जातियों की “सूची” के ‘आधार ‘ पर डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी ब्राह्मणों के खिलाफ जाकर अंग्रेजों से लड़कर हमें “मानवीय अधिकार” दिलाने में “सफल” हुए। तो हमें भी ये अच्छे से जान और समझ लेना चाहिए कि अनुसूचित का मतलब उस दौर में (अस्पृश्य, बहिष्कृत, हिन्दू धर्म से बाहर) मतलब जो हिन्दू नहीं थी वे जातियां है।

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‘अनुसूचित जाति’ हमारी संवैधानिक पहचान है और आज जो कुछ लाभ हम ले रहे हैं। वह सिर्फ अनुसूचित वर्ग के नाम पर।

 

“अनुसूचित” नाम के इतिहास की जानकारी होने के बावजूद भी हमारे लोग हिन्दू धर्म की पूंछ को पकड़े हुए हैं। अगर हम लोग अभी भी हिन्दू धर्म की पूंछ पकड़े हुए हैं तो नैतिक रूप से डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के संविधान का सरासर अपमान कर रहे हैं!

 

उम्मीद है आप यह मैसज आगे फारवर्ड करके समाज के लोगों को समझाने की अवश्य कोशिश करेंगे …

 

 जय भीम ! जय संविधान !


नोट :- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि ‘ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन’ इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.


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