Judicial Independence in India- ‘न्यायपालिका की आजादी पर सीधा हमला!’ जजों के तबादले में सरकार के दखल पर भड़के जस्टिस उज्जल भुइयां, कॉलेजियम को भी घेरा
Justice Ujjal Bhuyan on Executive Interference in Supreme Court Collegium and Judge Transfers

Judicial Independence in India-
Justice Ujjal Bhuyan on Executive Interference in Supreme Court Collegium and Judge Transfers
Judicial Independence in India- Judicial Independence vs Executive Interference: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब सुप्रीम कोर्ट का कोई मौजूदा न्यायाधीश सार्वजनिक मंच से अपनी ही संस्था और सरकार के बीच के ‘अघोषित तालमेल’ पर सवाल खड़ा करे। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां (Justice Ujjal Bhuyan) ने कुछ ऐसा ही किया है। उन्होंने जजों के तबादले और नियुक्तियों में केंद्र सरकार के बढ़ते दखल को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक “सीधा आघात” करार दिया है।
Judicial Independence in India- जस्टिस भुइयां का यह बयान न केवल कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि इसने ‘कॉलेजियम सिस्टम’ की पारदर्शिता पर भी एक नई बहस छेड़ दी है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
पुणे के प्रसिद्ध आईएलएस लॉ कॉलेज (ILS Law College) में “संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन” विषय पर एक व्याख्यान देते हुए जस्टिस भुइयां ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कॉलेजियम के उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें केंद्र सरकार के अनुरोध पर एक हाई कोर्ट जज के तबादले के प्रस्ताव में रातों-रात बदलाव कर दिया गया था।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि जजों के तबादले और नियुक्तियों में कार्यपालिका (Executive) की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि संवैधानिक रूप से स्वतंत्र माना जाने वाला तंत्र राजनीतिक प्रभाव में आकर काम करने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बुरा दिन होगा।
जस्टिस अतुल श्रीधरन का मामला: सजा या साधारण तबादला?
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने अक्टूबर 2023 की एक विवादित घटना का संदर्भ दिया। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा जस्टिस अतुल श्रीधरन (Justice Atul Sreedharan) की ओर था।
विवाद की जड़:
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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पहले जस्टिस श्रीधरन को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट भेजने का प्रस्ताव दिया था।
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लेकिन बाद में, कॉलेजियम ने इस प्रस्ताव को बदलकर उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित करने की सिफारिश की।
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चौंकाने वाली बात यह थी कि कॉलेजियम के आधिकारिक बयान में यह लिखा गया कि यह संशोधन “सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध” पर किया गया है।
जस्टिस भुइयां ने बताया कि अगर वे छत्तीसगढ़ जाते, तो वे वहां कॉलेजियम के वरिष्ठ सदस्य बनते। लेकिन इलाहाबाद जैसे बड़े कोर्ट में जाने से उनकी वरिष्ठता (Seniority) काफी नीचे चली गई।
“असुविधाजनक” आदेशों की क्या दी जा रही है सजा?
जस्टिस भुइयां ने एक बहुत ही गंभीर सवाल उठाया: “क्या किसी न्यायाधीश को सिर्फ इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में स्थानांतरित किया जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कुछ ‘असुविधाजनक’ (Uncomfortable) आदेश पारित किए?”
जस्टिस श्रीधरन को एक स्वतंत्र और निडर न्यायाधीश माना जाता है। उन्होंने एक सुओ मोटो (Suo Moto) मामला शुरू किया था जब एक सांसद-मंत्री ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी की थी। क्या इसी निडरता की सजा तबादले के रूप में मिली? जस्टिस भुइयां ने कहा कि जजों का तबादला केवल “न्याय के बेहतर प्रशासन” के लिए होना चाहिए, न कि सरकार को खुश न करने वाले फैसलों के लिए दंड देने के साधन के रूप में।
“अंदर से” है न्यायपालिका को खतरा Judicial Independence in India-
जस्टिस उज्जल भुइयां ने चेतावनी देते हुए कहा कि आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, बल्कि “अंदर से” आ सकता है। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र के लिए वह दिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा, जब किसी मामले का फैसला सिर्फ यह जानकर अनुमानित हो जाए कि वह किस न्यायाधीश या पीठ के सामने है।”
यह टिप्पणी सीधे तौर पर उन जजों की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है जो शायद सत्ता के दबाव में या किसी विशेष झुकाव के साथ काम करते हैं। उन्होंने साफ कहा कि न्यायपालिका को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए ही कॉलेजियम प्रणाली बनाई गई थी, लेकिन अगर कॉलेजियम ही सरकार के अनुरोधों को स्वीकार करने लगे, तो इसकी अखंडता खत्म हो जाएगी।
संवैधानिक नैतिकता और लोकतंत्र की रक्षा
जस्टिस भुइयां ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ (Constitutional Morality) पर जोर देते हुए कहा कि संविधान के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ इस नैतिकता का उल्लंघन है। उन्होंने कैरोलिन कैनेडी के शब्दों को याद करते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका अनिवार्य है। इसके लिए ऐसे जजों की आवश्यकता है, जो “समय की राजनीतिक हवाओं” के सामने झुके बिना डटकर खड़े रह सकें।
कॉलेजियम सिस्टम: पारदर्शिता की कमी?
जस्टिस भुइयां के इस बयान ने कॉलेजियम सिस्टम को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार अक्सर कॉलेजियम को “अपारदर्शी” कहती रही है, लेकिन जस्टिस भुइयां के अनुसार, समस्या यह है कि कॉलेजियम अब सरकार के अनुरोधों के सामने अपनी स्वतंत्रता खो रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के NJAC (National Judicial Appointments Commission) कानून को रद्द कर दिया था, तो इसका उद्देश्य न्यायपालिका को स्वतंत्र रखना था। अब उसी स्वतंत्रता को बनाए रखना कॉलेजियम की जिम्मेदारी है।

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निष्कर्ष: क्या अब जगेगी न्यायपालिका? Judicial Independence in India-
जस्टिस उज्जल भुइयां का यह साहसी बयान भारतीय न्यायपालिका के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यह स्पष्ट करता है कि जजों के बीच भी इस बात को लेकर चिंता है कि कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ रहा है। यदि जजों के तबादले उनकी वरिष्ठता छीनने या उन्हें ‘सजा’ देने के लिए किए जाएंगे, तो कोई भी जज निर्भीक होकर सरकार के खिलाफ फैसला देने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।
एक स्वतंत्र भारत के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका उतनी ही जरूरी है जितनी कि सांस लेने के लिए ऑक्सीजन। उम्मीद है कि जस्टिस भुइयां की यह आवाज कॉलेजियम के भीतर एक नई पारदर्शिता और दृढ़ता की शुरुआत करेगी।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जस्टिस उज्जल भुइयां के भाषण और समाचार रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं है।Judicial Independence in India-













