Elephant Death Due to IED-? “6 साल के हाथी की मौत ने खोल दी जंगल की तबाही की कहानी: कैसे माओवादियों ने सारंडा को बना दिया ‘ब्लास्ट ज़ोन'”

Elephant Death Due to IED-?


Elephant Death Due to IED-? “जंगल में उठी मौत की सूंड: माओवादियों के IED से कैसे मर रहे हैं हाथी, और बन रहा है ‘ब्लास्ट जोन’!”

? प्रस्तावना: एक दर्दनाक चीख जो जंगल में ही खो गई

Elephant Death Due to IED-? झारखंड का सारंडा जंगल, जो एक समय में एशिया का सबसे बड़ा साल वन माना जाता था, आज माओवादियों की IED पॉलिटिक्स का शिकार बन चुका है। अब वहां सिर्फ सुरक्षा बल ही नहीं, हाथी जैसे मासूम वन्यजीव भी अपनी जान गंवा रहे हैं। हाल ही में 6 साल की हथिनी और 15 साल के हाथी की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया।

Elephant Death Due to IED-? इन बेज़ुबानों की मौत सिर्फ एक जंगल की ट्रेजडी नहीं है, यह एक सिस्टम फेलियर और आतंक की नई परिभाषा है।


? सारंडा: एशिया का सबसे बड़ा जंगल अब बना ‘ब्लास्ट जोन’

900 वर्ग किलोमीटर में फैला यह जंगल कभी शांतिपूर्ण वन्यजीवों का घर हुआ करता था। लेकिन पश्चिम सिंहभूम जिले का यह इलाका अब माओवादियों के हथियारों और विस्फोटकों से भरा हुआ है।

यहां अब हर कदम मौत का खतरा है — ग्रामीणों के लिए, सैनिकों के लिए और अब हाथियों के लिए भी।


? हाथियों पर माओवादी बमों का कहर

? हाल की घटनाएं:

  • 28 जून 2025 को एक 6 साल की मादा हथिनी IED ब्लास्ट में गंभीर रूप से घायल हुई।

  • इलाज मिलने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

  • कुछ दिन बाद एक 15 साल का हाथी भी ऐसे ही विस्फोट में मारा गया।

  • और अब एक और 6 साल का हाथी घायल अवस्था में जंगल में भटक रहा है।

वन विभाग के अधिकारियों को डर है कि जंगल में और भी हाथी घायल हो सकते हैं, जिन्हें अभी तक ट्रैक नहीं किया जा सका है।


? खोज और बचाव में आई मुश्किलें

DFO अविरूप सिन्हा के अनुसार, यह इलाका बेहद संवेदनशील और खतरनाक है। कोई भी कदम IED विस्फोट का कारण बन सकता है।

  • ड्रोन और पेट्रोलिंग टीमों की मदद से हाथियों को खोजने की कोशिश की जा रही है।

  • लेकिन बारिश और घनी हरियाली के कारण ड्रोन से स्पष्ट दृश्य मिलना मुश्किल हो गया है।

  • घायल हाथियों की तलाश नदी किनारों पर की जा रही है, क्योंकि वे आमतौर पर वहीं आराम करते हैं।


? 2022 से अब तक IED ने 20 ग्रामीणों और 6 सैनिकों की ली जान

इस जंगल में केवल हाथी ही नहीं, अब तक 20 ग्रामीणों और 6 जवानों की जान भी IED से जा चुकी है।

  • कुछ लकड़ी बीनने निकले थे

  • कुछ महुआ चुनते वक्त IED की चपेट में आ गए

  • और अब हाथी भी इन खतरनाक विस्फोटकों के शिकार बन रहे हैं।

वनकर्मियों के पास ना कोई मैप है, ना कोई ट्रैकिंग डेटा — बस सावधानी और अनुभव के भरोसे ही टीम आगे बढ़ रही है।


? क्यों नहीं मिल रही मदद?

सिस्टम और तकनीक की सीमाएं भी सामने आ रही हैं:

  • घना जंगल + बारिश = ड्रोन फेल

  • IED का कोई नक्शा नहीं, क्योंकि कई बम सालों पुराने हैं

  • हर रास्ते में नया खतरा छिपा हुआ है

वन विभाग ने कई संवेदनशील इलाकों में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है।


? ओडिशा से मिलकर की जा रही संयुक्त कार्रवाई

सारंडा से ओडिशा के करमपाड़ा तक के रास्तों पर अब हाथी भाग रहे हैं।
40 हाथियों का एक झुंड हाल ही में ओडिशा के जंगलों की ओर चला गया।
अब झारखंड और ओडिशा की सरकारें मिलकर संयुक्त निगरानी और बचाव अभियान चलाने की योजना बना रही हैं।


? विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

वन्यजीव विशेषज्ञ डी.एस. श्रीवास्तव ने इसे अभूतपूर्व संकट बताया।
उनका कहना है कि पहली बार जंगल में इतने बड़े पैमाने पर हाथियों की जान जा रही है।

“हाथियों की चीख जंगल में गूंजती है, लेकिन कोई सुन नहीं रहा।”


? अब क्या हो सकता है समाधान?

  1. IED Mapping और Defusal Mission

    • आर्मी और CRPF की मदद से सभी संवेदनशील इलाकों की पहचान हो

  2. वन्यजीव-केंद्रित निगरानी अभियान

    • हाथियों के मूवमेंट पर विशेष निगरानी हो

  3. ग्रामीणों को IED की जानकारी देना

    • गांव-गांव में जागरूकता अभियान

  4. ड्रोन तकनीक में सुधार और AI-Based Detection

    • खासतौर पर बारिश वाले क्षेत्रों के लिए बेहतर कैमरे


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? निष्कर्ष: हाथियों की चीख अब इंसानों तक पहुंचे, इससे पहले देर हो जाए

Elephant Death Due to IED-? यह समय है जब हम सिर्फ सैनिकों की सुरक्षा नहीं, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा पर भी फोकस करें। माओवादियों की यह रणनीति सिर्फ सरकारी तंत्र को नहीं, पूरे इकोसिस्टम को बर्बाद कर रही है

यदि अब भी हम चुप रहे, तो आने वाले समय में शायद जंगल में हाथी नहीं, बस उनकी मौत की कहानियां ही बचेंगी।


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? “जंगल का राजा अब जंगल में सुरक्षित नहीं है।”
इस लेख को शेयर करें ताकि सरकार और समाज दोनों एक साथ आएं और हाथियों की सुरक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाएं।

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