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सवर्ण आरक्षण के साइड इफेक्ट: मोदी सरकार की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, कई राज्य कर रहे 50 प्रतिशत से अधिक कोटे की मांग | ऑनलाइन बुलेटिन

नई दिल्ली | [नेशनल बुलेटिन] | सवर्ण आरक्षण (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक सीलिंग का उल्लंघन कर बनाए गए कानून सवर्ण आरक्षण (EWS) को वैध ठहराए जाने के बाद अब कई राज्य सरकारें आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से संपर्क कर सकती हैं। ऐसे में राज्यों की सिफारिशें या अनुरोधों को स्वीकार या अस्वीकार करने की स्थिति में केंद्र सरकार को मुश्किल हो सकती है।

 

सुप्रीम कोर्ट के हालिया बहुमत के फैसले की इस रूप में व्यापक व्याख्या हो रही है कि कोटा की सीमा बढ़ाई जी सकती है, जिसे अब तक उल्लंघनीय नहीं माना जाता था। जजमेंट को सावधानीपूर्वक पढ़ने से पता चलता है कि इसने एससी/एसटी/ओबीसी के लिए कोटा की 50 प्रतिशत सीमा को सीमित कर दिया है, जबकि सवर्ण आरक्षण (EWS) को इसके दायरे से परे करार दिया गया है।

 

हालाँकि, ऐतिहासिक इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों पर चर्चा करते हुए, कोर्ट ने 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को “अटल नहीं” करार दिया है, जहां न्यायाधीशों ने व्यक्तिगत रूप से तर्क दिया कि “असाधारण स्थितियों” में 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्लंघन किया जा सकता है।

 

क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ

 

सवर्ण आरक्षण (EWS) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह धारणा बन चुकी है कि आरक्षण की ऊपरी 50 प्रतिशत सीमा को पार किया जा सकता है। आरक्षण मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले एक वकील, शशांक रत्नू, जिन्होंने सवर्ण आरक्षण (EWS) मामले में भी बहस की थी, ने TOI से कहा, “असाधारण परिस्थितियों में संवैधानिक संशोधन के माध्यम से 50 प्रतिशत ऊपरी सीमा के उल्लंघन को वैध बनाया जा सकता है।”

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कैसे बढ़ेंगी केंद्र सरकार की मुश्किल?

 

यदि राज्य सरकारों ने भी अपने कोटा कानूनों को कानूनी मान्यता देने के लिए संवैधानिक संशोधनों करने के लिए केंद्र सरकार को अर्जियां भेजनी शुरू कर दी तो केंद्र सरकार को राजनीतिक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

 

क्योंकि राज्यों की दलीलों को स्वीकार करना आसान नहीं होगा।

 

क्योंकि कई राज्य सरकारें नौकरियों और शिक्षा में कोटा को अभूतपूर्व स्तर तक ले जा सकती हैं। इससे सवर्ण आरक्षण (EWS) श्रेणी के लिए अवसर में कमी आ सकती है।

 

नीतीश कुमार ने केंद्र से की मांग

 

इसकी बानगी ऐसे देखने को मिल रही है कि सवर्ण आरक्षण (EWS) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक सप्ताह के भीतर ही, कई राज्यों ने स्थानीय कोटा बढ़ाने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी मांग की है कि केंद्र 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को हटा दे, जबकि झारखंड ने अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 77 प्रतिशत कर दिया है।

 

रविवार को ही, बिहार में सत्तारूढ़ सात-दलों के महागठबंधन के दो घटक दलों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से 23 नवंबर 2022 से शुरू होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र में एक कानून लाने का अनुरोध किया है, ताकि मौजूदा 50 प्रतिशत की कुल आरक्षण सीमा को 77 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सके। राजस्थान में भी ऐसी ही मांग उठी है कि ओबीसी कोटा 21 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया जाए।

 

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राजस्थान और महाराष्ट्र में गुर्जर और मराठा समुदायों को आरक्षण देने के लिए कानूनी संघर्ष जारी हैं। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जनवरी 2019 में मोदी सरकार ने एक संविधान संशोधन के जरिए सवर्ण आरक्षण (EWS) कोटा लागू कराया था। इसके बाद कई राज्यों ने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की कोशिश की थी लेकिन उसे न्यायिक मंजूरी नहीं मिल सकी थी।

 

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