कोई भी ज्ञान का दीया….

©प्रा.गायकवाड विलास

परिचय- मिलिंद महाविद्यालय, लातूर, महाराष्ट्र


 

 

पहले जमाने में कोई भी वृध्दाश्रम नहीं थे यहां पर,

देखो आज वृध्दाश्रम की यहां कोई भी कमी नहीं है।

नया युग है ये,नए युग की नई है ये बात निराली,

सिर्फ मां-बाप छोड़के देखो होती है यहां पे होली और दिवाली।

 

मिट्टी भरी दीवारों में कल था यहां कितना अपनापन,

आंगन में थी किलकारियां और मन में था कितना दुलार।

कहां गई वो कल की रीत,जहां रिश्ते थे प्यार भरें,

और आज के ज्ञान के उजालों में कहां रूकी है वो ममता की बहारें।

 

सूट-बूट में आया ये ज़माना,भूल गया है अपनी पहचान,

जहां अपने भी हुए पराएं और वो ख़ुदको कहता है इन्सान।

जो थामीं थी ऊंगली बचपन में,वो ही आज यहां निराधार है,

और मां का वो प्यार भरा आंचल देखो कितना बेबस है।

 

मां-बाप नहीं है साथ में,जिंदगी कट रही है उनकी वृध्दाश्रम में,

और आज का ये ज़माना देखो झूठे अश्क बहाता है संसार में।

गन्दे,फटे-पुराने कपड़ों में जिंदगी उनकी गुज़र गई तुम्हारे लिए,

उसी यादों में समेटी हुई जिंदगी उनकी आज भी मांगती है दुवाएं बच्चों के लिए।

 

बस इतना ही याद रखो तुम,वक्त ये भी अब गुजरनेवाला है,

रुकेंगी नहीं वो बहार,फिर वो पतझड़ यहां पे आनेवाला है।

उस दिन मां-बाप की जगह तुम होंगे उसी वृध्दाश्रम में,

यही रीत जिंदगी की पहचान लो तुम,तुम्हारा भी यहां पे वही इक ठिकाना है।

 

पहले जमाने में कोई भी वृध्दाश्रम नहीं थे यहां पर,

देखो आज वृध्दाश्रम की यहां कोई भी कमी नहीं है।

कोई भी ज्ञान का दीया कभी कहता नहीं मिटाओ रिश्तों का अपनापन,

बचपन,ज़वानी और बुढ़ापा वक्त के साथ साथ सबकुछ यहां गुजरनेवाला है – – –

 

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