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अनाज को भूसे से अलग करना अदालत का कर्तव्य, हत्यारोपी को बरी कर बोला कोर्ट anaaj ko bhoose se alag karana adaalat ka kartavy, hatyaaropee ko baree kar bola kort

नई दिल्ली | [कोर्ट बुलेटिन] | शिकायतकर्ता जय प्रकाश तिवारी की गवाही और सुने हुए सबूत के आधार पर हत्या के प्रयास के दोषी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बरी करते हुए कहा कि अनाज को भूसे से अलग करना अदालत का गंभीर कर्तव्य है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालतों को एक आरोपी के बचाव पर विचार करने की जरूरत है, जिसे वे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन सरसरी तौर पर नहीं।

 

मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2017 के फैसले को चुनौती देने वाले अपीलकर्ता जय प्रकाश तिवारी की दोषसिद्धि और सजा को खारिज कर दिया, जिसने निचली अदालत के आदेश के खिलाफ उनकी अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उसे हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहराया गया था।

अनुमानों पर आधारित था मामला, कोर्ट

न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला मात्र अनुमानों और अंदाजों पर आधारित था और आरोपी द्वारा पेश किए गए सबूतों को अदालत ने आकस्मिक तरीके से निपटाया।

 

 

 

It is the duty of the court to separate the grain from the straw, the court acquitted the killer and said

 

 

New Delhi | [Court Bulletin] | The Supreme Court on Thursday acquitted a man convicted of attempt to murder on the basis of the testimony of complainant Jai Prakash Tiwari and the evidence heard, saying that it is a serious duty of the court to separate the grain from the straw. The top court said that the courts need to consider the defense of an accused, which they can accept or deny, but not summarily.

 

A bench headed by Chief Justice NV Ramana set aside the conviction and sentence of appellant Jai Prakash Tiwari, who challenged the May 2017 judgment of the Madhya Pradesh High Court, which had dismissed his appeal against the trial court’s order. , in which he was convicted of attempt to murder.

 

 The case was based on conjecture, the court

 

A bench of Justices Krishna Murari and Hima Kohli observed that the prosecution’s case was based only on conjectures and conjectures and the court disposed of the evidence produced by the accused in a haphazard manner.

 

 

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