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लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय- गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन 1936 के लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया व्याख्यान जो इसलिए नहीं दिया जा सका, क्योंकि स्वागत समिति ने अधिवेशन को यह कहकर रद्द कर दिया था कि व्याख्यान में व्यक्त किए गए विचार अधिवेशन को स्वीकार्य नहीं होंगे।

 

1. इस सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए मैं क्यों अनुपयुक्त हूं।

 

मित्रों, जात पात तोड़क मंडल के जिन सदस्यों ने अत्यंत कृपा पूर्वक मुझे इस अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया है, उनके लिए मुझे सचमुच अफसोस है। मुझे यकीन है, उन लोगों से मुझे अध्यक्ष चुनने को लेकर अनेक प्रश्न किए जाएंगे। मंडल से पूछा जाएगा कि लाहौर में होने वाले अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए मुंबई से एक आदमी का आयात क्यों किया गया है। मुझे यकीन है, इस अवसर की अध्यक्षता करने के लिए मंडल को आसानी से कोई ऐसा व्यक्ति मिल सकता था, जो मुझसे अधिक योग्य हो। मैंने हिंदुओं की आलोचना की है, मैंने महात्मा (मि.गांधी) की सत्ता के आगे भी जिन पर उनकी श्रद्धा है प्रश्न चिन्ह लगाए हैं।

 

हिंदू मुझसे घृणा करते हैं, मुझे अपने बगीचे का सांप मानते हैं। निसंदेह राजनीतिक दिमाग वाले हिंदू भी मंडल से जवाब-तलब करेंगे कि उसने इस प्रतिष्ठित स्थान के लिए मुझे ही क्यों चुना है। यह बहुत साहस का काम है। यदि कुछ राजनीतिक दिमाग वाले हिंदू इसे अपने अपमान के रूप में लें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। मेरा चयन सामान्य धार्मिक दिमाग के हिंदुओं को भी अच्छा नहीं लग सकता है।

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मंडल से यह स्पष्ट करने को कहा जाएगा कि उसने अध्यक्ष का चयन करने में शास्त्रीय आदेश का उल्लंघन क्यों किया है। शास्त्रों के अनुसार, ब्राह्मण को तीनों वर्णों का गुरु नियुक्त किया गया है। वर्णायाम ब्राह्मणों गुर:1-यह शास्त्रीय निर्देश भी है। अतः मंडल को मालूम है कि किसी हिंदू को किससे शिक्षा लेनी चाहिए और किससे शिक्षा नहीं लेनी चाहिए। शास्त्र हिंदू को किसी भी व्यक्ति को गुरु स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता- वह चाहे कितना ही विद्वान हो।

 

महाराष्ट्र के ब्राह्मण संत रामदास ने, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने शिवाजी को हिंदू राष्ट्र स्थापित करने के लिए प्रेरित किया था। यह बात बहुत साफ कर दी है। ‘दासबोध’ 3 में जो मराठी में लिखा एक सामाजिक- राजनीतिक- धार्मिक ग्रंथ है, हिंदुओं को संबोधित करते हुए रामदास पूछते हैं : क्या हम किसी अंत्यज को इसलिए अपना गुरु स्वीकार कर सकते हैं क्योंकि वह पंडित (विद्वान) है?

 

रामदास इसका उत्तर देते हैं : नहीं।

 

इन प्रश्नों का उत्तर क्या देना है, यह मुझे मंडल पर ही छोड़ देना चाहिए। किन कारणों से अध्यक्ष चुनने के लिए मंडल मुंबई गया और उसने मेरे जैसे व्यक्ति को जो हिंदुओं के लिए इतना घृणास्पद है, चुना और इस प्रक्रिया में इतना नीचे गिर गया कि सवर्णों की सभा को संबोधित करने के लिए एक अंत्यज – अस्पृश्य को तय किया, इसकी सबसे ज्यादा जानकारी मंडल को ही होगी। अपने संबंध में मैं आपसे यह करने की अनुमति चाहता हूं कि मैंने आप के निमंत्रण को अपनी और अपने बहुत- से अछूत साथियों की इच्छा के बहुत विरुद्ध जाकर स्वीकार किया है।

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मैं जानता हूं, हिंदू मुझसे घृणा करते। मैं यह भी जानता हूं कि उनके बीच मैं एक अवांछित व्यक्ति हूं। यह सब जानने के कारण मैंने सदा अपने को उनसे अलग रखा। मैं उन पर अपने को थोपना नहीं चाहता। मैं अपने विचारों की अभिव्यक्ति अपने प्लेटफार्म से करता रहा हूं। इस कारण पहले से ही काफी नाराजगी और जलन पैदा हो चुकी है।

 

हिंदुओं के प्लेटफार्म पर बैठकर वह काम मैं उनकी आंखों के दायरे में नहीं करना चाहता, जो अभी तक उनके कानों के दायरे में करता आया हूं। यहां भी मैं अपनी इच्छा से नहीं, आपने मुझे चुना है, इसलिए हूं। आपका उद्देश्य समाज सुधार है। समाज सुधार एक ऐसा उद्देश्य है, जिससे मुझे हमेशा लगाव रहा है और मैंने महसूस किया कि इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के अवसर को ठुकराना नहीं चाहिए- खासतौर से तब जब आप समझते हो कि इस काम में मैं आपकी कुछ सहायता कर सकता हूं।

 

मैं आज जो कुछ कहने जा रहा हूं, उससे जिस समस्या से आप गिरे हुए हैं, उसका समाधान करने में किस तरह की सहायता मिल सकती है, इसका निर्णय आपको करना है।

 

मैं यहां जो कुछ कहना चाहता हूं, उसे समस्या के हल के लिए आप कहां तक ग्रहण कर सकेंगे, इसका फैसला आपको करना है। मैं सिर्फ यही काम कर सकता हूं कि आपके सामने इस समस्या पर अपने विचार रखूं।

 

*संदर्भ -: जाति का विनाश डॉ भीमराव अम्बेडकर

*पृष्ठ संख्या -: 35,36,37

 


नोट– उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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