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ब्रह्म सूत्र ~ द्वैत से अद्वैत की यात्रा | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©बिजल जगड

परिचय- मुंबई, घाटकोपर


 

वेद ब्रह्मा के अटूट वचन हैं, जो मोक्ष प्राप्त करने के लिए भ्रम (अहंकार) को तोड़ते हैं। जो द्वैत से अद्वैत की यात्रा है। वेदव्यास ने व्यक्तिगत रूप से नारद, उनके गुरु महाराज (आध्यात्मिक गुरु) के निर्देशों के तहत वेदांत-सूत्र लिखे, लेकिन फिर भी वे संतुष्ट नहीं थे। यह एक लंबी कहानी है, जो श्रीमद-भागवतम में वर्णित है।मूल रूप से केवल एक वेद था, और इसे पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

 

लेकिन पांच हजार साल पहले वेद व्यास ने इस युग यानी कलयुग में लोगों को पढ़ने के लिए वेदों को लिखित रूप में रखा था। वह जानते थे कि कलयुग में लोग अल्पकालिक होंगे, उनकी याददाश्त बहुत कमजोर होगी, और उनकी बुद्धि बहुत तेज नहीं होगी। वेदव्यास के द्वारा सभी वैदिक ज्ञान को चार वेदों में संक्षेपित किया गया है। यदि हम इसे देखें, तो वेद उपनिषद के भाग  ही हैं।

 

वेदांत का अर्थ है “परम ज्ञान,” और परम ज्ञान भगवान कृष्ण हैं। कृष्ण कहते हैं कि सभी वेदों में उन्हें ही समझने के लिए ही ज्ञान दिया गया है।

 

वेद अनादि काल से अस्तित्व में हैं, वेदों का जन्म सर्वोच्च सर्वशक्तिमान, परब्रह्म के हिरण्य_गर्भ (स्वर्ण गर्भ) से हुआ था और ऐसा माना जाता है कि ये चार वेद भगवान ब्रह्मा के 4 चेहरों से विकसित हुए हैं। इसलिए इसे ब्रह्म सूत्र भी कहा जाता है।

 

वेद कविताओं, मंत्रों, भजनों सहित पवित्र लेखन का एक विशाल संग्रह है ~ ब्रह्म सूत्र

 

आइए जानते हैं ये 4 वेद क्या और कौनसे है :

 

  1. ऋग्वेद: चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना जाता है। ऋग्वेद कई भजनों का एक संग्रह है, जो ज्यादातर भगवान की स्तुति में समर्पित है। इसमें बलिदान समारोहों के लिए भजन में शामिल किया गया हैं।
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  1. सामवेद: यह संगीत के लिए वेद है।

 

  1. यजुर्वेद : गद्य मंत्रों का एक संग्रह है, जिसका अर्थ है कि इसमें यज्ञ जैसे किसी भी अनुष्ठान को करने की प्रक्रियाएं शामिल हैं।

 

सतयुग में केवल 3 वेद थे सतयुग के अंत में चौथा वेद ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में आकाश में था। और उसकी शक्तियों से वृत्रा नाम का असुर चौथा वेद पढ़ सकता था।

 

वृत्रा नाम के एक असुर ने अपने पिछले जन्म में अथर्व ऋषि के रूप में जन्म लिया था, और उनके अच्छे गुणों के कारण, चौथा वेद लिखा गया था। ऋषि अर्थव ने भगवान शिव से इस मामले को अधिकृत करने का अनुरोध किया ताकि चौथे वेद को अथर्ववेद के रूप में जाना जाए।

 

  1. अथर्ववेद: अथर्ववेद हमारे शरीर के मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम के बारे में बताता है। (यह विभिन्न रोगों के लिए दवाओं से जुड़ा है)

 

भगवान शिव ने महसूस किया कि 3 वेदों में भगवान से जुड़ने के लिए संगीत, यज्ञ अनुष्ठान और मंत्र तो शामिल हैं। लेकिन उससे पहले आदमी को स्वस्थ रखने और अपने जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत होती है। इसलिए शरीर की शारीरिक संरचना के बारे में जानना और उसे बीमारियों के खतरे से बचाना जरूरी है।

 

ब्राह्मण सामान्य रूप से वेदों के कट्टर अनुयायी हैं। उन्होंने वेद के माध्यम से जीवन में लक्ष्य प्राप्त किए हैं। चार वेदों अर्थात् ऋग्, यजुर, साम और अथर्ववेदों में से हमारे महान पंडितों ने केवल तीन वेदों का जाप और पालन किया है।

 

अथर्ववेद का मुख्य रूप से काला जादू और जादू टोना करने वाले लोग करते हैं।

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इसलिए हमारे जीवन की शुद्धि के लिए पहले तीन वेदों का जाप किया जाता है और उसके बाद ब्राह्मण समुदाय के पंडितों द्वारा पालन किया जाता है।

 

यदि आप ब्राह्मण कुल में कुछ उपनाम जानते हैं  तो- त्रिवेदी का अर्थ है ‘वह जो तीनों वेदों को जानता है और वह सामवेद का अनुयायी है। चतुर्वेदी वे चार वेदों के ज्ञाता हैं जो अथर्ववेद के अनुयायी हैं और द्विवेदी दो वेदों के ज्ञाता हैं जो यजुर्वेद के अनुयायी हैं। उपाध्याय = ऋग्वेद के अनुयायी।

 

ब्रह्म सूत्र: ब्रह्म के मुख से विकसित जो ब्रह्म (द्वैत) से अद्वैत की यात्रा है।

 


नोट :- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि ‘ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन’ इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.


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