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दारा शिकोह अधुना एक दीप स्तंभ है – भाग दो daara shikoh adhuna ek deep stambh hai – bhaag do

©के. विक्रम राव, नई दिल्ली

–लेखक इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।


 

ओबामा को बताया गया कि मध्यकालीन शासकों की मौत अधिकतर समरभूमि में अथवा बीमारी से होती रही। मगर हुमायूं का असामयिक निधन पुस्तकालय भवन की सीढ़ी पर से उनके फिसलने के कारण हुआ था। हुमायूं संस्कृति के संरक्षक थे, इल्म में रूचि रखते थे। उसी परम्परा में था उसका पडपोता दारा।

 

वहां मकबरे में अतिथि रजिस्टर पर ओबामा ने लिखा भी कि : ‘‘साम्राज्यों के पतन अभ्युदय के दौर में भारत विश्व में नई ऊँचाइयां छूता रहा।’’ बराक और मिशेल ओबामा ने हुमायूं के मजार के निकट वाली ​कब्र गौर से देखी। वह उनके प्रपौत्र युवराज दारा शिकोह की है जो इतिहास का एक अत्यन्त त्रासद, कारुणिक पुरुष रहा। पुरातत्व अधिकारी ने राष्ट्रपति दम्पति को बताया कि दारा का सिरकटा धड़ यहां दफन है।

 

दारा को पिता शाहजहां अपना उत्तराधिकारी नामित कर चुके थे, पर कट्टरवाद के सूरमां औरंगजेब ने बाप को कैद कर लिया और बड़े भाई दारा को काफिर करार देकर चान्दनी चौक में हाथी से कुचलवा दिया था। दारा की कब्र देखकर और उनकी गाथा सुनकर बराक ओबामा के जेहन में वही विचार कौंधा होगा जो आम भारतीय आज भी तीन सदियों से सोचता है।

 

यदि भारत का बादशाह बजाय कट्टरवादी औरंगजेब के समरसतावादी दारा शिकोह हो जाता तो शायद मजहबी आतंकवाद की त्रासदी से हमारा उपनिवेश बच जाता। नामित बादशाह होने से कही ज्यादा दारा शिकोह एक सूफी फकीर थे। संस्कृत के ज्ञाता थे, इस्लाम और वैदिक धर्म के बीच सेतु थे। वे जड़ दृष्टि के खिलाफ थे जो उनके छोटे भाई औरंगजेब की खास पहचान थी। दारा उसे  सिर्फ नमाजी मानते थे जो इस्लाम के केवल बाह्य रूप को ही जानता था।

 

एक मायने में दारा शिकोह भी मुगल युग के बराक ओबामा जैसे ही थे। श्वेत अमरीका के उदारवादियों ने ओबामा को अपना लिया, मगर मध्यकालीन कट्टरवादियों ने दारा को मौत दिया।

 

आज की काशी पर मुगलराज की जजिया के अलावा यात्रीकर भी लगता था। दारा शिकोह ने निरस्त कराया, जकात फिर औरंगजेब ने थोप दिया। लेखक बच्चन सिंह (दैनिक गांडीव, 30 मई 2005) के लेख में है कि दारा शिकोह का बनारस से बहुत लगाव था। वह बनारस के पंडितों का बहुत सम्मान करता था और उनसे हिन्दू धर्मग्रंथों के बारे में जानकारी प्राप्त करता था। दारा ने वट भूमिक नामक एक संस्कृत ग्रंथ का अनुवाद भी किया था। एक जगह दारा कहते हैं कि उसने सूफी मत ग्रहण किया था। जब हिन्दू फकीरों से उसे पता चला कि दोनों मतों केवल शाब्दिक अंतर है, उसने 1658 में मजमून उल—बहरेन लिखा जिससे दोनों धर्मों में समंवय हो सके।

 

आजकल मुगलिया नाम बदलना रुचिकर हो गया है। सरसरी तौर पर यह कोई विवादास्पद नहीं होना चाहिए। किन्तु योगी आदित्यनाथ जी का तर्क गौरतलब है कि मुग़ल शासक भारत के हीरो कदापि नहीं कहे जा सकते। सही भी है।   खासकर, आलमगीर औरंगजेब के सन्दर्भ में| सिवाय संहार, हत्या, तोड़फोड़, जजिया, धर्मांतरण, ईदगाह (मथुरा) और ज्ञानवापी (काशी) बनाने के इस छठे मुगल बादशाह ने हिन्दुस्तान को दिया ही क्या ?  हाँ, अपने तीन सगे भाइयों की लाशें जरूर दीं। अब दिल्ली में औरंगजेब मार्ग का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग रखकर भाजपा शासन ने एक आदर्श भारतभक्त मुस्लिम वैज्ञानिक का सम्मान तो किया है।

part 2 of 2

 

 

Dara Shikoh Adhuna is a lamp pillar – Part Two

 

 

Obama was told that most of the medieval rulers died in summer or from disease. But Humayun’s untimely death was due to his slipping on the stairs of the library building. Humayun was a patron of culture, was interested in knowledge. His great-grandson Dara was in the same tradition.

 

There Obama also wrote on the guest register in the tomb that: “India continued to scale new heights in the world during the decline and rise of empires.” Barack and Michelle Obama looked closely at the tomb near Humayun’s tomb. It is that of his great-grandson Yuvraj Dara Shikoh, who was a very tragic, tragic man in history. The archeological officer told the presidential couple that Dara’s beaked torso was buried here.

 

Dara was nominated by his father Shah Jahan as his successor, but Aurangzeb, the architect of fundamentalism, imprisoned the father and had his elder brother Dara crushed by an elephant in Chandni Chowk, calling him an infidel. Seeing Dara’s grave and hearing his story, Barack Obama would have had the same thought that the common Indian still thinks for three centuries.

 

Had the emperor of India been Dara Shikoh instead of the fundamentalist Aurangzeb, perhaps our colony would have been saved from the tragedy of religious terrorism. More than a designated emperor, Dara Shikoh was a Sufi mystic. He was a knower of Sanskrit, was a bridge between Islam and Vedic religion. He was against the root vision which was the hallmark of his younger brother Aurangzeb.

 

Dara considered him only as a worshiper who knew only the outer form of Islam. In a sense, Dara Shikoh was also like Barack Obama of the Mughal era. White American liberals embraced Obama, but medieval fundamentalists put Dara to death.

 

Apart from the Jizya of Mughal Raj on today’s Kashi, there was also a travel tax. Dara Shikoh canceled, Zakat then imposed by Aurangzeb. It is in the article of writer Bachchan Singh (Dainik Gandiv, 30 May 2005) that Dara Shikoh was very much attached to Banaras. He had great respect for the Pandits of Banaras and used to get information about Hindu scriptures from them.

 

Dara also translated a Sanskrit text called Vat Bhumika. At one place Dara says that he had adopted Sufism. When he came to know from the Hindu mystics that the two sects were only a literal difference, he wrote Majmoon-ul-Bahren in 1658 to bring harmony between the two religions.

 

Nowadays changing the name of Mughalia has become interesting. Summarily this should not be controversial. But the logic of Yogi Adityanath ji is worth mentioning that the Mughal rulers can never be called heroes of India. It is right too. Especially, in the context of Alamgir Aurangzeb. What did this sixth Mughal emperor give to India except massacre, murder, sabotage, jizya, conversion, Idgah (Mathura) and Gyanvapi (Kashi)? Yes, he did give the dead bodies of his three real brothers.

 

Now by renaming Aurangzeb Marg in Delhi to APJ Abdul Kalam Marg, the BJP regime has honored an ideal Indian Muslim scientist.

 

 

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दारा शिकोह अधुना एक दीप स्तंभ है – भाग एक daara shikoh adhuna ek deep stambh hai – bhaag ek

 

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