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शिंटो संस्कृति – हिंदू संस्कृति – एक धार्मिक पवित्र मार्ग | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©बिजल जगड

परिचय- मुंबई, घाटकोपर


 

हिंदू धर्म जापान में एक छोटा-सा धर्म है, फिर भी जापानी संस्कृति के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण, लेकिन अप्रत्यक्ष भूमिका रही है। जैसे हम गोत्रों (ऋषियों के वंशज) की पूजा करते हैं और उनका पालन करते हैं, वैसे ही वे अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं।

 

बुद्ध के बाद बेंज़ाइटन (सरस्वती) जापान में सबसे अधिक पूजनीय देवता हैं। अन्य में लक्ष्मी, गणेश, इंद्र, ब्रह्मा, शिव, विष्णु, यम, कामदेव, वरुण, वायु और कई अन्य शामिल हैं।

 

बेनज़ाइटन (मा सरस्वती) 6वीं से 8वीं शताब्दी के दौरान जापान पहुंचीं, मुख्य रूप से गोल्डन सूत्र के चीनी अनुवाद के माध्यम से, जिसमें एक खंड उन्हें समर्पित है। लोटस सूत्र में भी उनका उल्लेख है। जापान में, लोकपाल (दुनिया के संरक्षक”) चार स्वर्गीय राजाओं का बौद्ध रूप लेते हैं जो

 

  • ब्रह्मा (बोंटेन)
  • इंद्र (तैशकुटेन),
  • यम (एन्मा),
  • शिव (मकीशुरा) है।

 

गोल्डन सूत्र अपने मूल संदेश के कारण जापान में सबसे महत्वपूर्ण सूत्रों में से एक बन गया, जो सिखाता है कि चार स्वर्गीय राजा उस शासक की रक्षा करते हैं जो देश पर उचित तरीके से शासन करता है।

 

यह अजीब लग सकता है लेकिन जापान में कई हिंदू देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। यह ज्यादातर इसलिए है क्योंकि कई बौद्ध मान्यताएं और परंपराएं जो हिंदू धर्म के साथ एक सामान्य आध्यात्मिक जड़ साझा करती हैं, बहुत पहले उस देश में फैल गई थीं। हिंदू ट्रिनिटी के सभी तीन देवताओं, कांगितेन (गणपति) शिक्षा के दाता, बेनज़ाइटन (देवी सरस्वती), बिशमोन (कुबेर) और कुछ अन्य देवी-देवताओं की जापान में पूजा की जाती है, हालांकि अलग-अलग नामों से।

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जापानी विचारधारा और संस्कृत हिंदू देवताओं से बेहद प्रभावित हैं जिन्होंने जापानी पौराणिक कथाओं के आधार पर अपने पैर रखे हैं। यहां हिंदू और जापानी दोनों देवताओं की सूची दी गई है, जिनकी दोनों विचारधाराओं में समान क्षमताएं और कार्य हैं। आइए हम भगवान और देवी के नाम और उनकी पूजा करने वाली मूर्तियों में उनकी समानता को समझते हैं।

 

  1. ब्रह्मा :

 

जापान में, विश्व के ‘निर्माता’ ब्रह्मा को बोंटेन के नाम से जाना जाता है। वह उन बारह देवों में से एक है जिन्हें अक्सर तैशकुटेन या इंद्र के साथ एक साथ दिखाया जाता है।

 

२. विष्णु :

 

संरक्षक’ जापान में बिचुटेन, मिशिचिजु और उनग्यो नामों से प्रकट होता है। उनके पर्वत गरुड़ को करुआ के नाम सेजाना जाता है, जो एक विशाल, अग्नि-श्वास प्राणी है। इसमें मानव का शरीर और चील का चेहरा या चोंच होती है।

 

३. लक्ष्मी (किचिजोतेन ):

 

विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी को भाग्य और योग्यता की देवी किचिजोतेन या कुडोकुटेन के नाम से जाना जाता है।

 

  • शिव (डाइकोकुटेन)-

 

‘विध्वंसक’ को जापान में मेकिशुरा के नाम से जाना जाता है। इस शब्द को भगवान शिव के कई नामों में से एक महेश्वर शब्द से लिप्यंतरित होने के रूप में देखा जा सकता है। भगवान को जापान में डाइकोकुटेन, दाइजाइजेटेन और इशानातेन के नाम से भी जाना जाता है।

 

  • गणपति (कांगिटेन)

 

गणपति या गणेश जी को जापानी में कांगिटेन के नाम से जाना जाता है। उन्हें टोक्यो में फुताको तमागावा के एक मंदिर में बुद्ध से बड़ा प्रदर्शित किया गया है।

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  • सरस्वती (बेंज़ाइटन) :

 

शिक्षा और विद्या की दाता देवी सरस्वती को जापान में बेंज़ाइटन के नाम से पूजा जाता है। उन्हें संगीत, कविता, शिक्षा और कला की देवी के रूप में पूजा जाता है और उन्हें जापान के ‘सात भाग्यशाली देवताओं’ में से एक माना जाता है।

 

  • इंद्र (तैशकुटेन)

 

देवों के राजा इंद्रदेव को जापान में तैशकुटेन के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वह सुमेरु पर्वत के ऊपर रहता है जिसे जापान में शुमिसेन के नाम से जाना जाता है।

 

दो सबसे धनी प्राच्य संस्कृतियों और धर्मों के बीच ये समानताएं भारत और जापान के बीच निरंतर क्रॉस-सांस्कृतिक संपर्क की संभावना की ओर इशारा करती हैं जो राजनयिक और आर्थिक सहयोग के लिए एक स्थिर आधार बनाती हैं।

 

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