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अधूरे किस्से सुनाती रही रात भर | ऑनलाइन बुलेटिन

©भरत मल्होत्रा

परिचय- मुंबई, महाराष्ट्र


 

अधूरे किस्से सुनाती रही रात भर,

बदन अपना जलाती रही रात भर,

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कोई परवाना आया नहीं पूछने,

शमा आँसू बहाती रही रात भर,

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दम घुटता रहा मेरा तनहाई से,

साँस रुक-रुक के आती रही रात भर,

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रक्स करता रहा चाँद तारों के साथ,

चाँदनी गुनगुनाती रही रात भर,

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मेरे दीदा-ए-तर में दीदार की,

ख्वाहिशें छटपटाती रही रात भर,

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रात भर दिल तुझे याद करता रहा,

आँख मोती बिछाती रही रात भर,

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मेरी हालत पे सिरहाने बैठी हुई,

नींद भी मुस्कुराती रही रात भर,

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