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मांसाहार के विज्ञापनों पर बैन लगाने वाली याचिका पर हाई कोर्ट बोला- ‘आप दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण क्यों करना चाहते हैं? | ऑनलाइन बुलेटिन

मुंबई | [कोर्ट बुलेटिन] | नॉन वेज फूड के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने की जैन धार्मिक संस्थाओं की मांग वाली याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि आप दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण क्यों कर रहे हैं. Mumbai News बता दें कि 3 जैन धार्मिक ट्रस्ट और एक व्यापारी ज्योतिंद्र शाह ने याचिका दायर कर मांसाहार भोजन के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. याचिका में उन्होंने दावा किया था कि ये विज्ञापन उनके शांति से जीने के अधिकार का उल्लंघन करते हैं.

 

उन्होंने आगे कहा कि उनके बच्चों सहित उनके परिवार को इन विज्ञापनों को देखने के लिए मजबूर किया जाता है. याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ये विज्ञापन न केवल उन लोगों को परेशान करते हैं जो शाकाहारी होने में विश्वास रखते हैं, बल्कि उनकी निजता के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन करते हैं.

 

इस याचिका पर न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति माधव जामदार ने कहा कि आप दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण क्यों करना चाहते हैं? हाईकोर्ट ने कहा कि इन विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाना क्या हमारे अधिकार क्षेत्र में है?

 

कोर्ट ने कहा कि यह एक विधायी कार्य है और राज्य का एक अंग होने के नाते हाई कोर्ट यह नहीं कह सकता कि सरकार को इस पर क्या कानून लाना चाहिए. यह विधायकों को तय करना है, हम केवल तभी हस्तक्षेप करेंगे जब किसी व्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन होगा.

 

वहीं याचिचाकर्ताओं के वकील गुंजन शाह ने कोर्ट की इस टिप्पणी पर कहा कि हम ये नहीं कह रहे कि मांस मत खाओ या इसे बेचो मत हम बस यह कह रहे हैं कि इसका प्रचार नहीं होना चाहिए.

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इस पर कोर्ट ने कहा कि आप हमसे इस पर कानून बनाने को कह रहे हैं, तो फिर संविधान के अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के बारे में क्या? आप दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण क्यों कर रहे हैं? गुंजन शाह ने कहा कि विज्ञापन मेरे घर में आते हैं जो कि मेरी निजता का उल्लंघन है.

 

वहीं चीफ जस्टिस ने इस पर कहा कि एक सामान्य व्यक्ति जिसे कोई जानकारी नहीं है वह टीवी बंद कर दे. लेकिन हम एक सामान्य नागरिक नहीं है हमें कानून के हिसाब से सोचना होता है और ऐसा कोई कानून नहीं जो इस पर प्रतिबंध लगा दे.

 

इस पर कानून सरकार को बनाना होगा. गुंजन शाह ने दावा किया कि आर्टिकल 51 (A) (g) के अनुसार जानवरों के प्रति दया दिखाना एक मौलिक कर्तव्य है और उन्होंने याचिका में संशोधन करने की मांग की. हालाांकि अदालत ने इसके बजाय एक नई याचिका दायर करने को कहा.

 

 

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