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अंधविश्वास और पाखण्ड से विलगाव शुरू | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय-   गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


 

हुजनों को अंधविश्वास और पाखण्ड के प्रति जागरूक करने, उनके खोए हुए गौरव को वापस दिलाने और उनके अधिकारों को संरक्षित करने के लिए बहुजन महापुरुष अलख जगाते आए हैं। लेकिन बहुजन समाज के लोगों के पंखों को धर्म की चाशनी में ऐसा डुबोया गया था कि वे उसमें से चाहकर भी उड़कर निकल ही नहीं पाएं। तथागत बुद्ध, संत कबीर, संत रैदास, संत तुकाराम, नारायणा गुरु बाबा गाडगे, ज्योतिबा फुले, पेरियार ई वी रामास्वामी, ललई सिंह यादव, जगदेव बाबू, राम स्वरूप वर्मा आदि महापुरुषों ने अपने-अपने समय में अथक प्रयास किए लेकिन आशातीत सफलता भले ही नहीं मिली, फिर भी उन्होंने अपने अनुभव और ज्ञान से बहुजनो के लिए भविष्य का मार्ग तो प्रशस्त अवश्य किया। बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर ने स्वतंत्र भारत को अंधविश्वास और पाखण्ड रहित भारत बनाने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने इसके लिए संविधान में प्रावधान किए ताकि भारत की आगामी पीढ़ी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हो सके, लेकिन सत्ताधारियों ने ईमानदारी से संविधान का अनुपालन नहीं किया।

 

आज बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर भले ही हमारे बीच नहीं हैं,लेकिन अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि उनकी विचारधारा अब पुनर्जीवित हो चुकी है। डॉ अम्बेडकर युग की शुरुआत के लिए बहुजन समाज बेचैन दिखने लगा है। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अब बहुजन जाग्रत हो उठा है। मैं आशावादी हूं और मुझे लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब भारत अंधविश्वास और पाखण्ड विहीन होकर,दुनियां में अपने खोए हुए गौरव को पुनः प्राप्त करेगा और भारत बौद्धमय होगा।

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यों तो बहुजनों को जाग्रत करने के लिए बहुजन समाज में बहुत सारे समाज सुधारक और नेता पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन निराशा यह है कि जाग्रत होने की गति थोड़ी धीमी है। लेकिन कहा जाता है कि जो धीमी आंच पर सब्जी पकाई जाती है उसका स्वाद बेहतर होता है।

 

आजमगढ़ के पूर्व सपा सांसद रमाकांत यादव ने अपने अंबारी स्थित आवास पर करीब एक दर्जन युवकों के हिन्दू-रक्षा सूत्र (कलावे) कटवाकर बहुजन समाज में व्याप्त अंधविश्वास और पाखण्ड के खिलाफ बिगुल फूंक चुके हैं। लगता है पेरियार ललई सिंह यादव की कोशिश अब रंग लाने लगी है। रमाकांत यादव ने युवकों को समझाने की कोशिश की, और उन्हें बताया कि किस तरह धर्म के नाम पर बहुजनों को मूर्ख बनाया जा रहा है।

 

उन्होंने कहा, कि जो पत्थर के देवी देवता स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं, वे भला अपने भक्तों की रक्षा कैसे कर पाएंगे? मंदिर में रखे भगवानों की रक्षा पुजारी करता है या फिर प्रशासन करता है, फिर ऐसे भगवान से क्या फायदा जो हमारी रक्षा न कर सके। उन्होंने युवकों का आवाह्न किया था कि उनका भला ज्ञान के मंदिर (विद्यालय) में जाकर अच्छी शिक्षा ग्रहण करने में ही निहित है न कि मंदिरों में जाने में। लेकिन वहीं दूसरी ओर, कुछ ऐसे भी नेता हैं,जो अन्धविश्वास और पाखण्ड में खुद भी लिप्त हैं, और कुंभ में डुबकी लगाकर अपने समाज को भी अन्धविश्वास और पाखण्ड में डूबने का मार्ग प्रशस्त कर चुके हैं।

 

एक ओर जहां भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में शासन – प्रशासन एक धर्म विशेष के धार्मिक आयोजनों पर जनता के टैक्स के पैसों को पानी की तरह बहाता है,वहीं दूसरी ओर समाज सुधारकों और वैज्ञानिक सोच रखने वालों के द्वारा अंधविश्वास और पाखण्ड के खिलाफ बिगुल भी फूंक दिया गया है।अब समय आ गया है कि बहुजन संगठित होकर जातिवाद, अंधविश्वास और पाखण्ड के खिलाफ आवाज उठाएं और बहुजन एकजुटता के लिए काम करें।

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अब लगने लगा है कि, बाबा साहब डॉ अम्बेडकर और उनकी विचारधारा अवसादित समाज के घरों से चलकर पिछड़े वर्गों में भी जगह पाने लगी है।अब लोग डॉ अम्बेडकर को पढ़ने लगे हैं, समझने लगे हैं। इस विचारधारा का फैलाव निश्चित ही बहुजन समाज के लिए अच्छा संकेत है। धीरे-धीरे ही सही,अब बहुजन समाज के सभी वर्गों में डॉ.अम्बेडकर की विचाराधारा पहुंचने लगी है।

 

‘ भवतु सब्ब मंगलम ‘

 

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