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मान्यवर कांशीराम की बसपा और आज की बहुजन समाज पार्टी | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय- प्रधान संपादक, प्रबुद्ध वैलफेयर सोसाइटी ऑफ उत्तर प्रदेश


 

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को रोपड़, पंजाब में एक रैदासी सिख परिवार में हुआ था। 1958 में बीएससी स्नातक होने के बाद कांशीराम पूना में रक्षा उत्पादन विभाग में सहायक वैज्ञानिक के पद पर नियुक्त हुए। डीआरडीओ, पूना में नौकरी के दौरान बाल्मीकि जाति का जुनूनी अम्बेडकरवादी कर्मचारी ‘दीनाभाना’ ने बाबा साहब द्वारा लिखित पुस्तक ” एनिहिलेशन ऑफ कास्ट ” (जाति का विनाश) कांशीराम को दी, जिसे कांशीराम ने एक ही रात में 3 बार पढ़ा। बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की इस पुस्तक को पढ़ने के बाद उनका कहना था कि इस पुस्तक ने मुझे जीवन भर का काम दे दिया है।

 

कांशीराम का जीवन त्याग और निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति’ को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया तथा इसकी प्राप्ति के लिए अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर दिया। जब उनकी मां ने उन्हें शादी करने के लिए कहा तो ” कांशीराम ” ने मां को समझाया कि उन्होंने समाज की भलाई के लिए ख़ुद को समर्पित कर दिया है। नौकरी छोड़ने पर उन्होंने 24 पन्ने का एक पत्र अपने परिवार को लिखा। उसमें उन्होंने बताया कि अब वे संन्यास ले रहे हैं और परिवार के साथ उनका कोई रिश्ता नहीं है। वे अब परिवार के किसी भी आयोजन में नहीं आ पाएंगे। उन्होंने इस पत्र में यह भी बताया कि वे ताजिंदगी शादी नहीं करेंगे और उनका पूरा जीवन बहुजन समाज के उत्थान को समर्पित है।

 

कांशीराम ने एक ऐसा मार्ग चुना था जिसके नेता भी वे स्वयं थे तथा कार्यकर्ता भी स्वयं। इसलिए उन्होंने एक विस्तृत योजना तैयार की। इस योजना की पहली कड़ी थी विचारधारा का चुनाव तथा उसका निरन्तर परिष्कार। उन्होंने बहुजनवाद की थीसिस विकसित की। जिसके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य 15% अल्पजन मनुवादी शोषक हैं तथा दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक 85% बहुजन समाज शोषित है। अर्थात कांसीराम ने 15% बनाम 85 % की लड़ाई का फार्मूला तय किया।

 

अपनी योजना की दूसरी कड़ी में कांशीराम ने बहुजन समाज बनाने के लिए सात समाज सुधारक जो बहुजन परिवारों में पैदा हुए थे। जिन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह किया था। संत रविदास, गुरु धासीदास, नारायण गुरु, ई वी रामासामी पेरियार,जोतिबा फुले, क्षत्रपति शाहूजी महाराज और बाबा साहब डॉ अम्बेडकर इनके विद्रोह को पुर्नजीवित कर अपने मिशन को भौगोलिक और सामाजिक विस्तार देने की योजना बनाई।

 

अपनी योजना की तीसरी कड़ी में उनकी नजर उन लाखों सरकारी कर्मचारियों पर पड़ी जिनके लिए बाबा साहब ने कहा था कि ” मुझे मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है ” मा कांशीराम को आंदोलन के लिए आवश्यक टाइम, टेलेंट और ट्रेजरर तीनों चीजें सरकारी कर्मचारियों के पास नजर आयी। उन्होंने प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से हजारों कर्मचारियों को तैयार किया। विचारधारा, कार्यकर्ता और नेता जैसे आवश्यक अंगों को तैयार करने के पश्चात् कांशीराम ने संगठन का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया।

 

साहब कांशीराम का मिशन :- 

 

कांशीराम राजसत्ता को ‘मास्टर चाबी’ कहते थे। वे राजसत्ता को साध्य नहीं साधन मानते थे, जिससे ” सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति ” के साध्य को प्राप्त किया जा सके। राजसत्ता की चाबी पाने के लिए कांशीराम ने समय अंतराल योजनाबद्ध तरीके से तीन संगठन की स्थापना की थी :-

 

1- बामसेफ की स्थापना – 

 

6 दिसम्बर 1978 को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर कांशीराम ने बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज कम्यूनिटीज एम्प्लाइज फेडरेशन ‘बामसेफ’ का गठन किया। बामसेफ एक नॉन पोलिटिकल, नॉन रिलिजियस और नॉन एजिटेशनल संगठन था। यह कर्मचारियों का संगठन होते हुए भी कर्मचारियों के लिए कोई कार्य नही करेगा। बल्कि इसके पीछे कांशीराम की धारणा थी कि बामसेफ के कर्मचारी समाज को अपना टाइम टेलेंट ट्रेजरर वापस देंगे (पे बेक) बामसेफ बहुजन समाज के लिए टीचर की भूमिका में कार्य करेगा। परिणामस्वरूप बामसेफ के कार्यकर्ताओं ने पूरे देश में साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, बौद्धिक आदि क्षेत्रों में मनुवाद के खिलाफ एक तूफान खड़ा कर दिया। तथा जाति धर्म में बंटे हुए बहुजन समाज को सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जोड़कर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओ की फ़ौज खड़ी कर दी।

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2- DS-4 की स्थापना – 

 

बामसेफ के गठन के तीन वर्ष बाद 6 दिसम्बर 1981 को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर कांशीराम ने DS-4 का गठन किया इस संगठन का पूरा नाम ” दलित शोषित समाज संघर्ष समिति ” था। यह संगठन राजनैतिक दल तो नहीं था। लेकिन इसकी गतिविधियाँ राजनीतिक दल जैसी ही थीं। बामसेफ की भूमिका अब DS-4 के माध्यम से संघर्ष में परिवर्तित हो चुकी थी। जिसकी वजह से कांशीराम के नेतृत्व में मनुवाद के खिलाफ एक जनआंदोलन खड़ा हो गया था। कांशीराम अपने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण शिविरों में कहा करते थे कि ‘ जिन लोगों की गैर-राजनीतिक जड़ें मजबूत नहीं हैं वे राजनीति में सफल नहीं हो सकते ’। अब बामसेफ और DS-4 की गतिविधियों से गैर राजनैतिक जड़े मजबूत हो चुकी थी और कांशीराम के सक्षम नेतृत्व से बहुजन समाज में राजनैतिक भूख भी पैदा हो गई।

 

3- बहुजन समाज पार्टी की स्थापना-

 

14 अप्रैल 1984 को बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के जन्मदिन पर कांशीराम जी ने ‘ बहुजन समाज पार्टी ’ की स्थापना की। उद्देश्य स्पष्ट था, पहले राजसत्ता की चाबी पर कब्जा करना फिर सत्ता की चाबी से सम्राट अशोक के श्रमण भारत की पुनर्स्थापना करना। उद्देश्य के अनुरूप जैसे ही बसपा की पहली बार सरकार बनी कांशीराम ने उत्तर प्रदेश को बौद्ध राज्य घोषित कर दिया। इस योजना के तहत बसपा की सरकार ने कहीं पत्थर भी गड़वाया तो श्रमण परम्परा के महापुरुषों के नाम का गड़वाया।

 

कांशीराम को जीवन में सबसे बड़ा झटका पार्टी गठन के मात्र दो वर्ष बाद तब लगा जब बामसेफ कांशीराम से अलग हो गया जिसका अफसोस अक्सर कांशीराम अपने भाषणों में किया करते थे कि ” मैंने मेरी जवानी का पूरा दिमाग और समय बामसेफ को तैयार करने में लगया था यह सोचकर कि समय आने पर बामसेफ का सदुपयोग कर मैं आसानी से बहुजन समाज को हुक्मरान समाज बना दूंगा लेकिन बामसेफ के कुछ लोगों की गद्दारी की वजह से बामसेफ को मुझसे अलग कर दिया गया। मैंने फिर तय किया कि अब मुझे अपने बलबूते पर ही इस मिशन को मंजिल तक पहुंचना होगा।”

 

कांशीराम की उपलब्धियों से यह तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि उन्हें बामसेफ का साथ मिला होता तो जरूर वे बहुजन समाज को हुक्मरान समाज बनाकर जाते। फिर भी यह कांशीराम का करिश्मा ही था कि उन्होंने बसपा को दूसरे चुनाव में ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाते हुए पार्टी गठन के ग्यारवें वर्ष में ही 3 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्य मंत्री मायावती को बना दिया। कांशीराम के संरक्षण में मायावती ने तीन बार कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला । उनका यह कार्यकाल इतना प्रभाशाली था कि मायावती ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। लेकिन 9 अक्टूबर 2006 को साहब कांशीराम का परिनिर्वाण हो जाने की वजह से अब मायावती की पूर्ण बहुत की सरकार पर कांशीराम का साया नही था।

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निष्कर्ष – के तौर पर कहा जा सकता है कि कांशीराम त्याग और समर्पण की सारी सीमाओं को लांघकर बहुजन समाज के प्रति संवेदनशील और अपने मकशद के प्रति जिद्दी थे। उनकी इस जिद का ही परिणाम था कि साधनहीन कांशीराम ने फुले, शाहू, पेरियार, डॉ अम्बेडकर मिशन जो बाबा साहब के निधन के साथ दफन हो चुका था। साहब कांशीराम ने उस मिशन को जीरो से शुरू कर पुनर्जीवित कर दिया। बहुजन आदर्श और बहुजन साहित्य की पहचान दिलाकर कांशीराम के सपनो का भारत सम्राट अशोक के भारत का बहुजन समाज को ख्वाब दिखाया। कांशीराम के बहुजनवाद ने मनुवाद को हमेशा के लिए अपराधी घोषित कर दिया। भविष्य में कांशीराम की बसपा भलेही खत्म हो जाय लेकिन कांशीराम का बहुजनवाद सदैव प्रासंगिक बनकर बहुजन समाज को प्रेरणा देता रहेगा।

 

कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती :- 

 

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर अपने अन्तिम दिनों में बहुत परेशान रहते थे। उनकी परेशानी का कारण जब उनके निजी सचिव नानक चंद रत्तू ने पूछा तो बाबा साहब ने बड़ी निराशा के साथ बताया कि, ” मैं विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए इस कारवां को यहाँ तक लाया हूँ लेकिन मैं इस तम्बू में अकेला बम्बू हूँ, पता नही मेरे जाने के बाद इस तम्बू का क्या होगा ?, इसलिए मेरे अनुयायियों से मेरा यही कहना है कि यदि ” आप इस कारवां को आगे नही बढ़ा सकते तो कोई बात नहीं लेकिन इसे पीछे हरगिज मत जाने देना।” अर्थात बाबा साहब को इस बात का बेहद दुःख था कि समाज में अभी तक कोई योग्य व्यक्ति तैयार नही हुआ जो मेरे जाने के बाद इस कारवां को संभाल सके।

 

बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी का योग्य उत्तराधिकारी ना होने की पीड़ा को मा कांशीराम अच्छी तरह समझ रहे थे, इसलिए उन्होंने हर स्टेट में योग्य नेता तैयार किये थे। उनमें से बहन मायावती ने तीन बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद सम्भाल कर सभी को पछाड़ दिया था। मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने प्रशासनिक कौशल का शानदार परिचय दिया। तथा बहुजन विचारधारा के प्रतीक और बहुजन समाज की भलाई के लिए अदभुत और शानदार कार्य किया।

 

बहन मायावती की कानून व्यवस्था, निर्णय लेने की क्षमता, विरोधियों से टक्कर, ओचक निरीक्षण, तेज तर्रार व्यक्तित्व, अनुशासन प्रियता, अविवाहित जीवन, निडरता आदि ऐसे गुण थे जिन्होंने न केवल कांशीराम को प्रभावित किया बल्कि पूरा बहुजन समाज ही बहन मायावती का मुरीद हो गया। आयरन लेडी, जिंदा देवी, परम् आदरणीय बहनजी, बहुजन समाज का स्वाभिमान आदि विशेषणों के साथ बहुजन समाज के दिल और दिमाग में मायावती का जादू शिर चढ़कर बोलने लगा। पूरे बहुजन समाज को मायावती पर भरोसा हो गया था कि कांशीराम का सबसे सक्षम उत्तराधिकारी मायावती ही है, कांशीराम ने भी अपने जीते जी बहन मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

 

मायावती का हर कदम मिशन का पतन :- 

 

कांशीराम के संरक्षण में मायावती ने तीन बार थोड़े थोड़े समय के लिए उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए जो कार्य किया उनका असली परिणाम- 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के रूप में दिखाई दिया। अब मायावती जी ने बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की जगह सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का राग अलापते हुए पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री तो बन गयी लेकिन 2012 का उत्तर प्रदेश चुनाव बुरी तरह हार गई, और यह सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का परिणाम था।

 

कांशीराम जी ने मायावती के हाथों में बहुजन मिशन का पूरी जिम्मेदारी दे दिया, इस जिम्मेदारी में बहुजन विचारधारा, बहुजन सांस्कृतिक प्रतीक, बहुजन मीडिया, देश व्यापी प्रशिक्षित नेता, कार्यकर्ता, लाखों सदस्य और असंख्य समर्थक आदि आदि थे। मगर बहुजन मिशन के इस जिम्मेदारी में से मायावती ने एक एक चीज को निकालकर फेंकना शुरू किया।

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(1-)मायावती ने बहुजन मिशन के जिम्मेदारी में से विचारधारा को निकाल दिया। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय अर्थात 15% बनाम 85% की विचारधारा जो दुश्मन और दोस्त की पहचान कराकर बहुजन समाज को इकठ्ठा कर रही थी। उसकी जगह मायावती ने सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का राग अलापना शुरू कर दिया। जिसका भयानक दुष्परिणाम यह हुआ कि बहुजनों ने अपनी बहुजन पहचान को खो दिया, जिसका फायदा उठाते हुए मनुवादियों ने बहुजन जातियों को मुसलमानों का डर दिखाकर अपने सनातन सांस्कृतिक जाल में फंसाकर हिन्दू बना लिया।

 

(2-) मायावती ने बहुजन मिशन की जिम्मेदारी में से बहुजन मिशन प्रचार तंत्र को खत्म किया। जिसमें सबसे पहले ” बहुजन संगठक ” अखबार को बंद किया, जागृति जत्थे, वाल पेंटिग जत्थे, बामसेफ के मिशनरी प्रचारक आदि पर मायावती ने कोई ध्यान नही दिया। जिसकी वजह से बहुजन मिशन का प्रचार तंत्र धीरे धीरे समाप्त हो गया। अब मायावती पूरी तरह मनुवादी मीडिया पर निर्भर रहकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सिमट कर रह गयी। मनुवादी मीडिया ने मायावती की छवि को खराब करने में कोई कसर नही छोड़ी लेकिन अब मायावती और मिशन के कर्मठ हिमायती लुप्तप्राय हो चुके हैं।

 

(3-) मायावती ने बहुजन मिशन की जिम्मेदारी में से त्यागी सक्षम नेता की जो स्वयं मायावती की छवि थी उसे पूरी तरह नष्ट कर लिया। जिस बहुजन समाज ने मायावती जी को बहनजी के रूप में स्वीकार कर अपना स्वाभिमान बना लिया था वह मायावती अब पारिवारिक मोह में फंसकर पूरी तरह बुआ बन चुकी हैं।आज बहुजन समाज जब कांशीराम और उसके परिवार की तुलना मायावती और उसके परिवार से करता है तो अपने आपको ठगा सा महसूस करता है।

 

(4-) मायावती ने बहुजन मिशन की जिम्मेदारी में से जो नेता साहब कांशीराम जी ने तैयार किया था उन्हें निकाल कर बाहर किया। उनकी जगह मायावती ने बिना रीढ़ की हड्डी के चाटुकार लोगों को प्रभारी बनाकर हर स्टेट पर थोप दिया। प्रभारियों की हवाई यात्रा, होटल में खाना रहना गरीब कार्यकर्ताओं पर बोझ बन गया। जो मिशन कभी मेम्बरशिप और मेंटेनेंस कूपन के पैसे से चलता था अब टिकिट बेचकर चलने लगा। टिकिट और पद के लालच में पार्टी से जुड़े हुए लोगों को प्रभारी लूट खसोटकर मायावती का आर्थिक टारगेट पूरा करते हैं साथ ही मायावती को झूँठी संगठन रिपोर्ट देकर साहब कांशीराम के मिशन को बर्बाद कर रहे हैं।

 

निष्कर्ष के तौर पर मान्यवर कांशीराम साहब ने अपने भाषणों में महाराष्ट्र के लोगों से अक्सर कहा करते थे कि, ” मैंने महाराष्ट्र में रहकर दो बातें सीखी हैं, मिशन कैसे चलना चाहिए यह मैंने बाबा साहब डॉ अम्बेडकर जी से सीखा है और मिशन कैसे नही चलना चाहिए यह मैंने महाराष्ट्र के महारों से सीखा है।” ठीक इसी तरह यह कहा जा सकता है कि मिशन कैसे चलाया जाता है यह सीखना है तो मान्यवर कांशीराम साहब जी से सीखिए और मिशन को कैसे खत्म किया जाता है यह सीखना है तो बहन मायावती जी से सीख लीजिए ?

 

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