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हिन्दी साहित्य में गोरख, रैदास और कबीर की उपेक्षा क्यों ? | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©राजेश कुमार बौद्ध

परिचय-   गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


 

क्या कारण है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में सिद्धों-नाथों को महत्व नहीं दिया जो आज की हिन्दी में महाकवि गोरखनाथ की कहीं चर्चा ही नहीं है।

 

आचार्य रामचन्द्र  शुक्ल ने जब 1929 ई0 में अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास को पूर्ण किया तो कतिपय प्राप्त तथ्यों के आधार पर कुछ कहने का प्रयास किया। साहित्यिकता की दृष्टि से सिद्धों और नाथों की रचनाओं को कोई महत्व नहीं दिया, आचार्य शुक्ल का इतिहास बहुत महत्वपूर्ण एवं अन्तिम नहीं है।

 

हिन्दी परम्परा में गोरखनाथ तथा सिद्धों पर विपुल कार्य करने वाले महापण्डित राहुल सांस्कृत्यायन का नाम सदैव आगे रहेगा। उन्होंने अपनी तिब्बत यात्रा में इस सम्बन्ध में बहुत कार्य किये है। हिन्दी काव्य धारा में इनकी रचनाओं को संकलित किया, आज तक इनसे अधिक कोई कार्य नहीं कर सका है।

 

गोरखनाथ के जीवन-तथ्यों के सम्बन्ध में ऐसी ही कठिनाइयां होती है, फिर भी विद्वानों ने इस सम्बन्ध में कुछ न कुछ विचार कहने का प्रयत्न किया है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते है- ‘उनके जन्म स्थान का कोई निश्चित पता नहीं है चलता है।

 

वास्तविकता यह है कि गोरखनाथ के जन्म-स्थान और समय को बताने में कतराते है। ब्रिग्स महोदय को गोरखपुर केे महन्त से इस सम्बन्ध में पूछने पर उत्तर मिला था कि ”गोरखनाथ संयुक्त पंजाब प्रदेश के झेलम के गोरक्ष टिला से गोरखपुर आये थे।“

 

” जी. डब्ल्यू . ब्रिग्स ” का कहना है कि गोरखनाथ मूलतः एक बज्रयानी बौद्ध थे।

 

नेपाल में उनका महत्व आज भी विद्यमान है और नेपाल अपने को गोरखा राज्य कह कर गौरवान्वित समझता है। परन्तु इतना तो निश्चित है कि गोरखनाथ स्वयं हिमालयवासी रहे हैं, और उन्होंने नेपाल में बौद्धमत के साथ थे।

 

गोरखनाथ के जन्म पर भी भ्रामक प्रचार प्रसार किया गया है। मत्स्येन्द्र नाथ जी ने चन्द्रगिरि गांव की निवासिनी सरस्वती नाम बन्ध्या स्त्री को सन्तान प्राप्ति के उद्देश्य से मंत्र द्वारा अभियिन्त्रित भस्म खाने के लिए दी थी, परन्तु सरस्वती ने उसे अपने पड़ोसिन स्त्रियों की बातों में आकर गांव के बाहर एक गोबर के गड्ढे में डाल दिया था। फलतः गोरखनाथ ने आयोनिज रूप में उसी गड्ढे से जन्म लिया। 12 वर्ष बाद मत्स्येन्द्रनाथ उसी गांव में पुनः आये और बालक को गड्ढे से बाहर निकालकर उसका नाम गोरख रखा और अपने साथ लेकर चल दिए।

 

यहां कितनी विडम्बना है कि ब्राह्मणों ने साहित्य में इतना घपला किया कि किसी मनुष्य का जन्म स्त्री से न होकर तमाम तरह के अन्धविश्वास फैला कर अपना धन्धा चला रखा है। जैसे कबीर को आसमान के तारे से तो गोरखनाथ को गोबर की धुर से और रैदास जी को पूर्व जन्म ब्राह्मण होने का प्रमाण देता है। जो पूरी तरह असत्य है।

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सवाल यह है कि क्या गोरखनाथ ने जोग ही जगाया था ? या लोगों को जगाने में भी उनकी कोई भूमिका थी। जो लोग सिद्धों-नाथों के जनता पर सिद्धई की धाक जमाने की बात करते है वे इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि नाथ-सिद्ध जाति- व्यवस्था, और अंधविश्वास पाखंड के विरोधी थे। इसका बहुत गहरा और व्यापक प्रभाव जनता पर पड़ रहा था। ये जाति-व्यवस्था और छुआ-छूत का विरोध कर रहे थे। इस बात का लोक चेतना के माध्यम से आम जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ रहा था, इस प्रकार जिस तरह हम संत साहित्य को प्रगतिशील साहित्य मानते है उसी तरह हमें नाथों-सिद्धों साहित्य को भी प्रगतिशील मानना चाहिए।

 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को बाईपास करते हुए राम विलास शर्मा अपने आपको हिन्दी का दूसरा सबसे बड़ा आलोचक मानते है। शर्मा जी जब सिद्धों-नाथों के बारे में बात करते हैं तो वे लिखते है कि हमारा निर्गुण भक्ति साहित्य इन कनफटे जोगियों का मोहताज नहीं था। ध्यान दें कि शर्मा जी निर्गुण भक्ति साहित्य को प्रगतिशील मानते हैं लेकिन यह बात मानने से इन्कार करते हैं कि निर्गुण भक्ति साहित्य की पृष्ठभूमि में सिद्धों-नाथों का साहित्य है।

 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने साहित्य-इतिहास में सिद्धों- नाथों के साहित्य को सांप्रदायिक शिक्षा मात्र घोषित कर दिया। साथ ही उन्होंने सिद्धों की वाणियों को सांप्रदायिक शिक्षा मात्र कह कर उसे खारिज किया। यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है। अगर इनका साहित्य सांप्रदायिक शिक्षा मात्र है या धार्मिक उपदेश मात्र है तब तो हमें तुलसीदास, मीरा, बाल्मिकि, सूरदास आदि को भी खारिज करेंगे। क्योंकि भक्ति, कालीन साहित्य में बहुत ज्यादा धार्मिक प्रवृतियां हैं। ‘जिस आधार पर आप सिद्धों- नाथों के साहित्य को खारिज कर रहे हैं उस आधार पर पूरा हिन्दू धर्म का साहित्य ही खारिज हो जायेगा।

 

एक बात और कि सिद्धो- नाथों का साहित्य एक भिन्न परंपरा का साहित्य है और यह परंपरा बहुत ही मूल्यवान परंपरा है। इस परंपरा की दृष्टि से उसका मूल्यांकन होना चाहिए। यह परंपरा अपनी अवधारणा में वैकल्पिक व्यवस्था को महत्व देती आई है। यह परंपरा परिवर्तनकारी है, यथा-स्थितिवाद को तोड़ती है। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करती है। इसलिए इस साहित्य को इसी सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इस आधार पर राहुल सांस्कृत्यायन और हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पुनर्मूल्यांकन किया। रामविलास शर्मा जैसे आलोचक रामचंद्र शुक्ल की मान्यताओं को दोहराते हैं।

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इसका कारण है आप देखिए कि तुलसीदास, रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा ये तीनों वेदांत के पक्के प्रेमी हैं। भारतीय वेदांत, जो भाववादी दर्शन पर टिका है। रामविलास शर्मा अपनी परंपरा में बुद्ध की चितंन परंपरा को स्वीकार ही नहीं करते हैं। वह यह स्वीकार ही नहीं करते हैं कि हिंदी साहित्य में बुद्ध के चिंतन-दर्शन का कोई प्रभाव कहीं भी पड़ा है। उसे वे खारिज करते है। वे यह बताना चाहते हैं कि हिन्दी साहित्य में जो वेद, वेदांत, पौराणिक परंपरा आदि का प्रभाव हैं, वहीं हमारे हिंदी साहित्य में आया है। बुद्ध के चिंतन का कोई प्रभाव नहीं आया है। यहां तक कि वे सिद्धों-नाथों के योगदान को भी नहीं स्वीकारते है जो कि बुद्ध के चिन्तन का सीधे विकास दिखाई पड़ता है। उनकी ये बातें मेरे गले से नीचे नहीं उतरती।

 

ये लोग उसके पक्ष में खड़े हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय कवि कबीर है जबकि आचार्य शुक्ल के प्रियकवि तुलसीदास हैं। नामवर सिंह के प्रिय कवि मुक्तिबोध हैं तो रामविलास शर्मा के प्रिय कवि निराला है। निराला भी उसी वेदांती परंपरा से आते हैं। इस तरह रामविलास शर्मा वैदिक-पौराणिक ब्राह्मणवादी अकादमी में ही प्रगतिशीलता तलाशते हैं। इस ब्राह्मणवादी अकादमी के बाहर जो स्वतन्त्र रूप से मूलमानव की प्रगतिशील चेतना विकसित हो रही थी, उसकी वे घोर उपेक्षा करते हैं। मैं इसलिए ये सब बातें कह रहा हूं क्योंकि सिद्धो-नाथों के चिंतन की जमीन से हिन्दी साहित्य का विकास हुआ है। ये चिन्तक उस चिंतन की जड़ ही काट देना चाहते हैं। वास्तव में सिद्धो-नाथों का साहित्य बौद्ध दार्शनिकों की बहुत ही समृद्ध चिंतन परंपरा से प्रवाहित साहित्य है।

 

आप सोचिए कि रामविलास शर्मा को बुद्ध का नवजागरण क्यों नहीं दिखाई दिया। इसका कारण यह है कि बुद्ध का नवजागरण जाति-व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ था। इस नवजागरण की चेतना ब्राह्मणवादी अकादमी की नींव हिला दी थी। रामविलास शर्मा हिंदी जाति का गौरव तुलसीदास को बताते हैं। यह सही है कि मध्यकाल के तुलसीदास एक कवि है। लेकिन उसी काशी में लोक जागरण के नायक एवं महाकवि रैदास और कबीरदास भी है। वे हिंदी जाति का गौरव क्यों नहीं है? तुलसीदास इसलिए हिंदी के जातीय गौरव हैं कि वर्ण-व्यवस्था और वेदांत के समर्थक है। साधारण जनता में जनजागरण करने वाले रैदास और कबीर हिंदी जाति के गौरव क्यों नहीं होंगे?

 

काशी विश्वनाथ का मन्दिर गौरव है। जबकि उसी काशी में सारनाथ है जो बौद्ध धर्म का केन्द्र है। वह हिन्दी प्रदेश का गौरव क्यों नहीं है? यदि काशी विश्वनाथ मन्दिर अपनी धार्मिक आस्था के कारण गौरव है तो इसमें दलितों और मुसलमानों की क्या होगा जिनका प्रवेश ही यहां वर्जित है।

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बुद्ध की परंपरा जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में खड़ी होती है। इसके माध्यम से हमारे यहां तीन महत्वपूर्ण सामाजिक क्रांतियां हुई है। एक बुद्ध की सामाजिक क्रान्ति, दूसरे भक्ति की सामाजिक क्रान्ति, तीसरे दलित आन्दोलन की सामाजिक क्रान्ति। तीनों क्रान्तिकारी आन्दोलनों के केन्द्र में कहीं न कहीं जाति और वर्णव्यवस्था का कड़ा प्रतिरोध है। इसलिए सिद्धों-नाथों की चिंतन परंपरा बुद्ध के सामाजिक चिंतन का अगला विकास है। बौद्ध दार्शनिकों ने भारतीय सामाजिक चिंतन को तार्किक प्रणाली से युक्त किया है। यह दुनिया के सभी धर्मों में सबसे तार्किक धर्म है।

 

लेकिन चिंतन के आधार पर वह बहुत ही आगे बढ़ा हुआ धर्म दर्शन है। वर्ण-व्यवस्था के विरोध में खड़ा है। इस दर्शन के बड़े चिन्तक- अश्वघोष, दिंगनाग आदि है। जब दिंगनाग पंडितों की सभा में शास्त्रार्थ के लिए जाते थे तो पंडित दिंगनाग से बहुत घबराते थे। वैसे ही घबराते थे जैसे आगे चल के निर्गुण धारा के संतों में कबीर और रैदास से ‘रैदास’ के सामने पोथी-पंडित लाचार हो जाते थे। जब मैं कबीर, रैदास को देखता हूं तो मुझे दिंगनाग की याद आ जाती है। बौद्ध दार्शनिकों में दिंगनाग के सामने आते ही भागवादियों की घिग्घी बंध जाती थी। उसी प्रकार रैदास, कबीर का जो ज्ञान है- सामाजिक अनुभव से प्राप्त यथार्थ ज्ञान है उसके सामने पोथी- पंडित लाचार दिखाई देते है।

 

ये सभी सिद्ध तथा योगी अधिकांश निम्न जातियों से आते है, घर को छोड़ने के उपरान्त ये गुरू को ही सब कुछ मान लेते थे, फिर माता-पिता आदि को महत्व देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। असंस्कृत समाज के लोग कहे जाते है। इसी कारण इन संतों का वर्चस्ववादी ब्राह्मण विरोध करते रहे है ? आज हमारा आधुनिक दलित साहित्य आज भले बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की वैचारिकी से शुरू हुआ हो लेकिन उसमें अस्पृश्यता-जाति-व्यवस्था के विरोध की चेतना वहीं से ली है। इसलिए सामाजिक चिंतन की दृष्टि से सिद्धों- नाथों की चिंतन परंपरा बहुत ही समृद्ध रही है, जो वहां से होकर निर्गुण धारा से होते हुए दलित साहित्य तक आती है।


नोट :– उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि ‘ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन’ इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.


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