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मानवीय प्रदूषण | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©श्याम निर्मोही

परिचय – बीकानेर, राजस्थान.


 

मैंने सुना है और पढ़ा भी है कि

गांव शहर की बनिस्बत अच्छे होते हैं

गांव का वातावरण शुद्ध होता है

गांव का पर्यावरण शुद्ध होता है

शुद्ध हवा मिलती है

जो मनुष्य को स्वस्थ

और मस्तिष्क को तरोताज़ा रखती है

 

जबकि शहर अटे पड़े हैं गंदगी से

अटे पड़े हैं प्रदूषण से

अशुद्ध वातावरण

अशुद्ध पर्यावरण

अशुद्ध हवा

जो किसी धीमे और

साइलेंट ज़हर से कम नहीं है

बेवक्त ही कब कौन दुनियां से

चला जाए पता नहीं ?

 

पर मेरा दृष्टिकोण

मेरा आंकलन

अलग है

शहर गांव की बनिस्बत अच्छे होते हैं

शहर के लोग भले ही मानवता का

धर्म नहीं निभाते हो

मगर यह भी नहीं कि किसी को

मानव ही नहीं समझते

कम से कम प्रत्यक्ष रूप से तो

किसी को ऊंचा या नीचा नहीं समझते

भले ही उनके अंदर ज़हर भरा पड़ा हो

पर वह उगलते नहीं

 

जबकि गांव में मानवता का धर्म तो निभाते हैं

पर मानव को मानव नहीं समझते हैं

एक मानव स्वयं को उच्च और

दूसरे को नीच समझता है

भीतर ज़हर रखता भी है

और उगलता भी है

और कई बार उसी ज़हर से

उस‌ नीच को अमानवीय मौत के

घाट उतार देता है ….

 

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