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सच्चा प्रेम sachcha prem

©संतोष यादव

परिचय– मुंगेली, छत्तीसगढ़.


 

बोधकथा

 

प्रेम क्या है? यह जानने से पहले प्रेम और मोह के भेद को जानना पड़ेगा। प्रेम का जन्म करुणा से होता है और मोह का जन्म अहंकार से होता है। प्रेम में व्यक्ति कहता है कि ईश्वर मेरे पुत्र या पुत्री को संसार के सारे सुख देगा और मोह में व्यक्ति कहता है मैं अपने पुत्र या पुत्री को संसार का सारे सुख दूंगा। प्रेम में व्यक्ति कहता है मुझे अपने पुत्र या पुत्री पर गर्व है और मोह में बंधा व्यक्ति कहता है मेरे पुत्र या पुत्री को मुझ पर गर्व हो। प्रेम धर्म है और मोह अधर्म।

 

प्रेम हम सभी से करते हैं,स्वयं से, अपने माता-पिता, भाई-बहन, पति- पत्नी, पुत्र-पुत्री, मित्र, रिश्तेदार, राज्य और देश से। परंतु क्या हम उसे या वो हमें वास्तविक प्रेम करते हैं? क्या हम उनके प्रेम से संतुष्ट हैं या वो हमारे प्रेम से संतुष्ट हैं? नहीं!

 

क्योंकि हम प्रेम के वास्तविक अर्थ को नहीं जानते हैं। प्रेम दो प्रकार के होते हैं- प्रथम स्वार्थपरक प्रेम और दूसरा नि:स्वार्थ प्रेम। यदि किसी व्यक्ति से प्रेम के बदले में कुछ पाने की आशा या इच्छा रखते हैं तो, यह स्वार्थपरक प्रेम है और इसी कारण से हमें या उन्हें दुःख होता है। किसी व्यक्ति से यदि बिना किसी आशा से प्रेम करते हैं तो यह नि:स्वार्थ प्रेम होता है और यह हमें सुख और संतोष देता है, शांति देता है।

 

स्वार्थपरक प्रेम अवनति का कारण है, यह अधर्म है। नि:स्वार्थ प्रेम उन्नति देता है और यही धर्म है। तो वास्तव में आप समझ चुके होंगे कि जिसे हम प्रेम कहते हैं, उस प्रेम से तात्पर्य नि:स्वार्थ प्रेम से ही होता है। जैसे- हमारे माता-पिता के प्रेम, ईश्वर के प्रेम, गुरू के प्रेम, सच्चे मित्र के प्रेम, सच्चे प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम। जिस तरह से प्रेम भगवान श्रीकृष्ण और राधा ने किया था। राम और सीता ने किया था।

 

Santosh Yadav

 

 

storytelling

 

what is love? Before knowing this, one has to know the difference between love and infatuation. Love is born out of compassion and attachment is born out of ego. In love, a person says that God will give all the happiness of the world to my son or daughter, and in love, a person says that I will give all the happiness of the world to my son or daughter. A person in love says I am proud of my son or daughter and a person in love says my son or daughter should be proud of me. Love is religion and attachment is adharma.

 

We love all of us, ourselves, our parents, brothers and sisters, husband and wife, son and daughter, friends, relatives, state and country. But do we love Him or does He really love us? Are we satisfied with his love or is he satisfied with our love? No!

 

Because we don’t know the real meaning of love. There are two types of love- first selfish love and second selfless love. If we have a hope or desire to get something in return for love from a person, then it is selfish love and for this reason we or them feel sad. If we love a person without any hope then it is selfless love and it gives us happiness and contentment, gives peace.

 

Selfish love is the cause of degradation, it is unrighteousness. Selfless love gives progress and that is religion. So actually you must have understood that what we call love, that love means selfless love only. Like- love of our parents, love of God, love of teacher, love of true friend, love of true lover-girlfriend. The way Lord Krishna and Radha did love. Ram and Sita did it.

 

 

देवों के देव महादेव devon ke dev mahaadev

 

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