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अम्बेडकरवादी साहित्य को बहुजन समाज तक पहुंचा रहे “प्रबुद्ध विमर्श” के संपादक राजेश कुमार बौद्ध का महत्वपूर्ण साक्षात्कार, पढ़ें | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

बहुजन समाज में अपने विचारों से क्रांति ला रहे राजेश कुमार बौद्ध किन परिस्थितियों में बहुजन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे है। उन्होंने किन कठिनायों का सामना करना पड़ा बता रहे हैं एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार में बस्ती के सरोज गौतम जी को… पढ़ें ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन पर ।

 

 

1. सबसे पहले मैं चाहता हूँ,आप हमारे पाठकों को अपना परिचय दें-

 

मेरा नाम राजेश कुमार बौद्ध, गोरखपुर,उत्तर प्रदेश के निवासी है, अनुसूचित जाति के उपजाति के चमार हैं, 1990 में मैंने हिन्दू धर्म त्याग कर अपने दीक्षा गुरु “अंगमहापंडित भदन्त ज्ञानेश्वर जी के द्धारा बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी, मैं गोरखपुर के गोरखनाथ क्षेत्र में रहता हूं, मेरी शिक्षा- केवल एम ए तक हो पायी, पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के कारण आगे नहीं पढ सका। बचपन से ही मेरी लेखन के क्षेत्र में रुचि रही है, महापुरुषों की जीवनियां पढ़ने और उसे अमल में लाने की हमेशा से कोशिश रही है। समाज में फैले कुप्रथाओं, कुरितियो, अंधविश्वास, जातिवाद का विरोध मैंने बचपन से ही किया था, आज मैं अपने पेशे (अम्बेडकरवादी साहित्य के अलावा बहुजन समाज की पत्र-पत्रिका को बेचने) के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से हिन्दी मासिक पत्रिका “प्रबुद्ध विमर्श ” का नियमित 15 बर्ष से प्रकाशित कर समाजसेवा करने और लेख- रचनाएं लिखने की कोशिश करता हूं। मेरी रचनाएं, समय समय पर संपूर्ण भारत के पत्र- पत्रिकाओं के साथ हिन्दी दैनिक अखबार जैसे ख्वाजा एक्सप्रेस- बस्ती, निष्पक्ष दिव्य संदेश- लखनऊ, तिजारत- लखनऊ, जन संदेश- लखनऊ, पब्लिक पॉवर- रायबरेली आदि में प्रकाशित हो रही है।

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2. साहित्य क्षेत्र में अभी तक क्या क्या लिख चुके हैं आप-

 

लेखन क्षेत्र में अभी तक मैंने करीब एक दर्जन से अधिक पुस्तकें, 5 सौ कविताएं, 125 से ऊपर लधुकथाऐ और 40 कहानियाँ लिखी है। सम्पूर्ण भारत के मासिक पत्र – पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते हैं जो नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं, जिसमें कुछ पत्रिकाओं के उपसंपादक-अशोक मार्ग, दलित टाइम्स, अम्बेडकर मिशन पत्रिका, नागवंसी संदेश, शम्बूक, अतिदीपोंभवः प्रबुद्ध जगत पत्रिका के साथ ही साथ अब तो जागो, का संपादक का दायित्व निभाया है। इस समय “प्रबुद्ध विमर्श पत्रिका” का संपादक के साथ ही साथ डॉ अम्बेडकर साहित्य प्रतिष्ठान के संचालक और डॉ भीमराव अम्बेडकर पुस्तकालय एण्ड पब्लिकेशन का प्रबंधक हूँ।

 

3. मुख्यत: आपके लेखन का कोई एक विशेष विषय रहता है या विभिन्न विषयों पर लिखतें है। यदि विभन्न विषयों पर लिखतें है तो कौन कौन विषय आपके लेखन में सम्मलित रहते हैं-

 

वैसे तो मेरे लेखन की शुरुआत, बहुजन महापुरुषों के ऐतिहासिक कार्यो को लेकर हुई थी। मनुवादी लेखक और इतिहासकारों ने बहुजन समाज के महापुरुषों के इतिहास को दबाने छिपाने और मिटाने प्रयास किया है और आगे भी करते रहेंगे, मैं उन ऐतिहासिक विषयों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूं। मैं समाज में फैले कुप्रथाओं कुरितियो, ढोंग, चमत्कार, अंधविश्वास, जातिवाद, ब्राह्मणवाद के साथ ही साथ महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय अत्याचारों, गरीबों के शोषण आदि सभी सामाजिक समस्याओं को लेकर लिखता हूं।

 

4. बहुत सारी बाधाएं आपको इस सफर में आई होंगी, ऐसी किसी बाधा का जिक्र करना चाहेंगे-

 

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जरुर;

 

मैं आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हूँ, मेरे विचारों को पढ़ने के बाद कुछ उच्च वर्ग के लोगों के द्वारा मुझे धमकाने का कार्य किया गया, मैं कुछ समय के लिए विचलित जरुर हुआ पर मैंने हार नहीं मानी। वे लोग मेरे आस पास रहने वाले लोग ही थे। मेरी जीविका के साधन को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई थी, मेरे लेखन पर तीन मुकदमें चल रहे हैं।

 

5. कहते हैं कि सहित्यकार समाज का दर्पण होता है, परन्तु उसी समाज में साहित्यकार को उसके साहित्य की वजह से नुकसान पहुंचाए जाने को आप किस तरह देखतें हैं। इस प्रकार की घटनाओं से डर नहीं लगा? ये सब छोड़ने का मन नहीं हुआ आपका?

 

-सर;

 

भारत का इतिहास देखिए, असमानता के पोषको ने समानता के राह पर चलने वालो को हमेशा नुकसान पहुंचाया है। साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति से अपना काम बनाने की कोशिश की है, फिर भी जिसके रगो में मानवता और इंसानियत है, वह अपने साथ होने वाली हिंसा से डरकर अपने विचारों से पीछे नहीं हटते। हमने भी अपने समाज महापुरुषों का गौरवशाली इतिहास पढा है, उनसे सबक सीखा है, मुझे यह अहसास है कि मैं भले ना रहूं लेकिन मेरे विचार क्रांति जो मेरे बहुजन समाज के महापुरुषों की देन है, वह आने वाले दिनों में हमारे भावी पीढ़ी के दिलो- दिमाग को स्वस्थ कर सके। साहित्य समाज का आईना होता हैं, कब जब वह साहित्य लोगों को मानवता और इंसानियत की शिक्षा दे। डरने वाली क्या बात है, मरना तो एक दिन सबको है, क्यूँ न कुछ अच्छा करके मरें।

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6. आपके इस हौसले और जज्बे को हम सलाम करतें है व कामना करते हैं कि आप निरन्तर उन्नति प्रगति करते रहें। अन्य कोई बात जो आप हमारे साथ साझा करना चाहें-

 

मैं आज के युवाओं से आह्वान करना चाहता हूं कि, वे अपने महापुरुषों का गौरवशाली इतिहास पढे। अपना कीमती समय अपने भविष्य बनाने में लगाएं, नशा से दूर रहे, विज्ञान और संविधान का अनुसरण करें, साहित्य लेखन में सक्रिय रहे। लिखे- पढे समाज का निर्माण करें, रुढ़िवादी परंपराओं को त्यागें, चमत्कारवाद- ब्राम्हणवाद से दूर रहे, शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करें।

 

आपका सादर आभार गौतम जी

नमो बुध्दाय जयभीम , जय संविधान.

 

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