उसी ममता की छांव में…
©गायकवाड विलास
परिचय- मिलिंद महाविद्यालय, लातूर, महाराष्ट्र
आंचल मां का सभी को मिलें,
जन्नत उसी मां के पैरों तले ।
सागर से बढ़कर मां की ममता,
उसी ममता की छांव में कलियां खिलें।
बेरहम जमाने में कौन किसी का है,
ममता भरा युग वो अब कहां है ।
बीत गई सदियां ढह गई वो मिट्टी,
अब कौन यहां पे दुसरों को देखता है।
मां के निगाहों में होता है प्यार,
मां बिना ये जिंदगी है बड़ी लाचार।
बहते अश्कों को कौन देखें यहां,
ऐसी बदली निगाहों में डुबा है ये संसार।
भले ही कट जाए ये जिंदगी गमों में,
मगर बीत जाए ये जिंदगी मां के कदमों में।
मां जैसी प्रीत कहीं न मिलें इस जहां में,
ऐसी मां का साया हो हर किसी के आंगन में।
आंचल मां का सभी को मिलें,
जन्नत उसी मां के पैरों तलें ।
आखरी सांसों तक मिले मां की ममता,
उसी ममता की छांव में ये सारा संसार खिले

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