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कैसा प्यार है | ऑनलाइन बुलेटिन

©मजीदबेग मुगल “शहज़ाद” 

परिचय- वर्धा, महाराष्ट्र


 

हंसी उडगई लबो की ये कैसा प्यार है।

हर रोज उनसे होती रहती तकरार है।।

 

समझ से बाहर हो गया उनको समझना ।

हद से ज्यादा माथा पच्ची बेजार है ।।

 

प्यार किया क्यों अहसान जरूरत सबकी।

न बढाओ रिश्ता आगे कहदो नकार है ।।

 

मोहबत एक दुसरे को समझ ने का नाम है।

फिर खुद कहो इस बात का इजहार है ।।

 

हाथों मे हाथ हर जगह दोन्हो का साथ ।

समझदार नहीं दो की जिन्दगी बेकार है ।

 

आपकी मोहब्बत जमाने को दर्स हो ।

ज़िन्दगी बर्बाद करने वाले गुन्हागार है।।

 

दो दिल का आपसी सौदा निभाना रिश्ता ।

वैसे अपनी मर्जी दुश्मन लगे हजार है ।।

 

‘शहज़ाद ‘दुवा प्यार करने वालों के लिए।

खुशी तो ये चाहतदार साथ बरकरार है।।

 

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