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मज़लूम | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©भरत मल्होत्रा

परिचय- मुंबई, महाराष्ट्र


 

 

बुजुर्गों की तेरे हाथों से ना तौहीन हो जाए

तेरी बातों से कोई दोस्त ना गमगीन हो जाए

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मिल जाए अगर इसमें किसी मज़लूम का आँसू

घड़ी में दरिया मीठे पानी का नमकीन हो जाए

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उदासी में किसी की घोल दें थोड़ी सी खुशियां तो

दिन अपना भी आज का ये बेहतरीन हो जाए

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कत्ल मेरा मेरे कातिल तू एहतियात से करना

कहीं ना खून से लथपथ तेरी आस्तीन हो जाए

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कड़वा है ज़ायके में बहुत है फायदेमंद लेकिन

सच कहने का, सुनने का जो तू शौकीन हो जाए

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बचा सकती नहीं ताकत कोई फिर उस हुकूमत को

जहां हक माँगना भी जुर्म इक संगीन हो जाए

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