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मुफलिसी | ऑनलाइन बुलेटिन डॉट इन

©भरत मल्होत्रा

परिचय- मुंबई, महाराष्ट्र


 

शायद अभी भी मुझको कोई तुमसे आस है

इसके लिए तो दिल मेरा इतना उदास है

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संग गिरे तुझ पे और ज़ख्म हो मुझे

तू अब भी इस कदर मेरे दिल के पास है

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तेरे बगैर तख्त ओ ताज भी नहीं कबूल

तू साथ है मेरे तो मुफलिसी भी रास है

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साकी हटा ले जाम मेरे सामने से तू

मय से ना बुझेगी ये आँखों की प्यास है

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ज़ख्म हो रुसवाई का या चाहे कर्ब-ए-ज़ात

अपने लिए हर चोट मुहब्बत की खास है

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मेरी बरहनगी का उड़ाते हो क्यों मज़ाक,

हर शख्स तेरी बज़्म में तो बेलिबास है

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मंजिल खुद आ गई है पता पूछते हुए

तू लग रहा है जैसे मेरे आस पास है

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