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संस्कार | ऑनलाइन बुलेटिन

©सरस्वती राजेश साहू, बिलासपुर, छत्तीसगढ़


 

 

मानव मूल्यों को अपने आप में समा लेने वाला तथा सद्गुणों के अभूषणों से सुशोभित मानव चरित्र को उत्तम बनाने वाला ज्ञान है। जो मनुष्य को माँ के गर्भ से ही मिलना प्रारंभ हो जाता है।

 

संस्कार को मानव के मन, बुद्धि, क्रिया, कर्म में स्त्रोत की तरह बहाने वाली मातृका होती है जो निश्छल भाव से अपने संतति के भीतर अनन्य गुणों का आविर्भाव करती है इसलिए माँ को प्रथम गुरु भी कहा जाता है। यद्यपि संस्कार को चरणों में विभक्त किया गया है इसके प्रकार भी बतलाये जाते हैं। (1) गर्भाधान संस्कार, (2) पुंसवन संस्कार, (3) सीमन्तोन्नयन संस्कार, (4) जातकर्म संस्कार, (5) नामकरण संस्कार, (6) निष्क्रमण संस्कार, (7) अन्नप्राशन संस्कार, (8) मुंडन संस्कार, (9) कर्णवेधन संस्कार, (10) विद्यारंभ संस्कार, (11) उपनयन संस्कार, (12) वेदारंभ संस्कार, (13) केशांत संस्कार, (14) सम्वर्तन संस्कार, (15) विवाह संस्कार और (16) अन्त्येष्टि संस्कार।

 

यह मनुष्य के आरम्भ से लेकर अंत तक की होने वाले संस्कार है इनका वर्णन तथा उल्लेख वृहत रुप में किया जाता है। किन्तु सामान्य शब्दों में संस्कार मनुष्य जाति को गुणों व धर्मों से अवगत कराते हुए मानवता का ज्ञान देना तथा मानव मूल्यों को परिलक्षित कर सभ्याचार को बढ़ावा देना है। संस्कार हमारी भारतीय संस्कृति की विरासत में अमूल्य धरोहर है जो प्रत्येक इंसान को आचरणगत शिष्टता व सभ्यता का प्रसाद के रूप में आवंटित करता है जो माता के गर्भ व गोद से लेकर पिता, गुरु, परिवार, समाज,देश व सृष्टि से सीखता हुआ मनुष्य अपने जीवन को गुण व सद्ज्ञान से कृतार्थ करता है। ईश्वर से प्रदत्त इन गुणों कर्मों में क्रियान्वयन करना तथा आने वाले पीढ़ी को इसके लिए शिक्षा देना संस्कार का अभिन्न अंग है और संस्कृति सृष्टि में संस्कार की ही उपज नीति व रीति है।

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संस्कार के अभाव में मनुष्य, मनुष्य नहीं बल्कि पशु की भाँति असभ्य हो दुष्कर्म को करता हुआ चरित्रहीन होकर मान-सम्मान से परे निष्ठुरता को हृदय में धारण कर पाप के मार्ग में चलता हुआ अधम कार्य को करता है परिणाम स्वरूप विनाशकारी पथ्य में जाकर स्वयं तथा अपने परिवेश को भी असभ्य कर अशांति व विनाश की ओर ले जाता है।

 

अतयेव संस्कार मानव ज्ञान व दर्शन के लिए अति आवश्यक है।यह लोगों में अभीष्ट गुण, धर्म व संस्कृति को समावेश कर ईश्वर के शुभ्र ज्ञान व आध्यात्मिक चेतना को प्रसारित कर परम तप व साधना से सिद्धि को प्राप्त करता हुआ मोक्षप्रद मार्गदर्शन पाकर परमार्थ का ग्रहणाधिकारी हो जाता है। संस्कार ही मानव को दानव से अलग कर दिव्यपुरुष के रूप में परिवर्तित कर ईश्वर तुल्य बना देता है।

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