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तू भी मेरी ही गलती का पुतला निकला | ऑनलाइन बुलेटिन

©भरत मल्होत्रा

परिचय- मुंबई, महाराष्ट्र


 

तू भी मेरी तरह ही गलती का पुतला निकला,

मैंने समझा था तुझे क्या और तू क्या निकला,

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तमाम शहर के अबरू पे तब शिकन आई,

मैं जब कभी भी ढूँढने तेरा पता निकला,

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आज छोड़ा जो आसमां में तो ये राज़ खुला,

बाज दिखता था जो हमको वो फाख्ता निकला,

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नहीं कसूर किसी का मेरी तबाही में,

मेरा नसीब ही मुझसे खफा-खफा निकला,

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मैं क्यों ना जीता-जागता खुदा कहूँ माँ को,

इसी के पैरों से जन्नत का रास्ता निकला,

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