RSS: बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे क्या RSS का ‘सीक्रेट प्लान’ था? अंदर की कहानी जानकर चौंक जाएंगे
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद फिर चर्चा में आया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, क्या शाखाओं और ‘सॉफ्ट रणनीति’ ने बदल दिया पूरा खेल?

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RSS: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद फिर चर्चा में आया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, क्या शाखाओं और ‘सॉफ्ट रणनीति’ ने बदल दिया पूरा खेल?
RSS: बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के पीछे क्या RSS का मास्टरप्लान था? चुनाव के बाद तेज हुई नई बहस
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने देश की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है. भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और वर्षों से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका दिया.
लेकिन चुनावी नतीजों के बाद सबसे ज्यादा चर्चा जिस संगठन को लेकर हो रही है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS.
संघ हमेशा यह कहता रहा है कि वह सीधे चुनावी राजनीति में हिस्सा नहीं लेता. लेकिन बंगाल चुनाव के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या इस बार RSS ने पर्दे के पीछे रहकर बीजेपी की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2021 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार संघ कहीं ज्यादा सक्रिय नजर आया.
आखिर क्यों चर्चा में आया RSS?
बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत सिर्फ सीटों का आंकड़ा नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य की राजनीति में बड़े वैचारिक बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस बार संघ ने अपने सहयोगी संगठनों और स्वयंसेवकों के जरिए गांव-गांव और गली-गली तक पहुंच बनाई.
कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि RSS से जुड़े कार्यकर्ता लोगों के बीच यह संदेश लेकर पहुंचे कि यह चुनाव “हिंदू समाज के अस्तित्व” से जुड़ा हुआ है.
यही वजह है कि चुनाव के बाद धार्मिक ध्रुवीकरण और वैचारिक राजनीति को लेकर बहस और तेज हो गई.
RSS: शाखाएं बनीं सबसे बड़ी ताकत?
RSS की सबसे मजबूत इकाई उसकी “शाखाएं” मानी जाती हैं.
जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल में इस समय RSS की करीब 4500 शाखाएं सक्रिय हैं. दस साल पहले यह संख्या करीब 1000 के आसपास थी.
यानी एक दशक में संगठन ने राज्य में अपनी जमीनी पकड़ कई गुना बढ़ा ली.
संघ से जुड़े लोग कहते हैं कि शाखाओं का उद्देश्य लोगों को राष्ट्रहित, सामाजिक सेवा और मतदान के प्रति जागरूक करना है, न कि किसी पार्टी का प्रचार.
RSS के प्रांत व्यवस्था प्रमुख सीताराम डागा ने कहा कि स्वयंसेवक सिर्फ लोगों से राष्ट्रहित में मतदान करने की अपील करते हैं.
उनके मुताबिक:
“हम यह नहीं कहते कि बीजेपी को वोट दीजिए. हम सिर्फ इतना कहते हैं कि जो राष्ट्रहित और समाजहित में काम करे, उसे चुनिए.”
हालांकि आलोचकों का कहना है कि यही “सॉफ्ट अप्रोच” लंबे समय में लोगों की राजनीतिक सोच को प्रभावित करती है.
RSS: क्या इस बार ज्यादा सक्रिय था संघ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार संघ ने पहले की तुलना में कहीं ज्यादा संगठित तरीके से काम किया.
घर-घर संपर्क, फोन कॉल, पारिवारिक मुलाकातें और छोटे स्तर पर संवाद—यह पूरी रणनीति काफी प्रभावी मानी जा रही है.
संघ से जुड़े वरिष्ठ प्रचारक बिजॉय आद्या के मुताबिक इस चुनाव को हिंदू समाज के “अस्तित्व” के सवाल से जोड़ा गया.
उन्होंने दावा किया कि लोगों को बंगाल के इतिहास, विभाजन और बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति का हवाला देकर सतर्क किया गया.
यहीं से चुनाव में हिंदुत्व और सुरक्षा जैसे मुद्दे ज्यादा मजबूत होकर उभरे.
RSS: बीजेपी की जीत में एंटी-इंकम्बेंसी भी बड़ा फैक्टर?
हालांकि सिर्फ RSS को बीजेपी की जीत का कारण मानना आसान नहीं होगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी माहौल भी बड़ा कारण रहा.
लंबे समय से सत्ता में रहने की वजह से जनता के एक वर्ग में नाराजगी थी.
बीजेपी ने इसी नाराजगी को “परिवर्तन” और “गुड गवर्नेंस” के मुद्दे के साथ जोड़ने की कोशिश की.
बीजेपी नेताओं का कहना है कि संघ का समर्थन स्वाभाविक है क्योंकि दोनों की विचारधारा राष्ट्रवाद पर आधारित है.
पार्टी प्रवक्ताओं के मुताबिक RSS कार्यकर्ताओं ने नीचे स्तर पर “राष्ट्रवाद” और “अच्छे शासन” को लेकर माहौल बनाया.
RSS: धार्मिक ध्रुवीकरण का मुद्दा क्यों उठा?
चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने इसे “हिंदुत्व की जीत” बताया था.
इसके बाद यह सवाल और तेज हो गया कि क्या बंगाल चुनाव इस बार हिंदू बनाम मुसलमान की राजनीति में बदल गया था?
कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान प्रोफेसर ज़ाद महमूद का कहना है कि चुनाव में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण साफ दिखाई दिया.
उनके मुताबिक:
“RSS लंबे समय तक सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर काम करता है और धीरे-धीरे लोगों की सोच को प्रभावित करता है.”
उनका मानना है कि बंगाल में बीजेपी को “स्वीकार्य विकल्प” बनाने में RSS की बड़ी भूमिका रही.
RSS: बंगाल की राजनीति में क्या बदल गया?
एक समय बंगाल को वामपंथ और बौद्धिक राजनीति का गढ़ माना जाता था.
यहां “भद्रलोक संस्कृति” यानी पढ़े-लिखे और उदारवादी मध्यमवर्ग की छवि काफी मजबूत रही है.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी को समर्थन देने वाले इसी वर्ग की संख्या बढ़ी है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ.
RSS ने लंबे समय तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सामाजिक संपर्कों और वैचारिक गतिविधियों के जरिए धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई.
2021 में तृणमूल कांग्रेस बीजेपी को “बाहरी पार्टी” बताने में काफी हद तक सफल रही थी, लेकिन 2026 में यह रणनीति पहले जैसी असरदार नहीं दिखी.
RSS: महिलाओं और युवाओं पर खास फोकस
जानकारी के मुताबिक इस बार RSS और उसके सहयोगी संगठनों ने महिलाओं और युवाओं तक पहुंच बनाने पर भी खास ध्यान दिया.
सीमा से जुड़े जिलों में “सीमांत चेतना मंच” जैसे संगठनों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया.
सोशल मीडिया और लोकल नेटवर्किंग का इस्तेमाल भी बड़े स्तर पर किया गया.
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाला वैचारिक अभियान था.
RSS: क्या सरकार बनने के बाद और बढ़ेगा RSS का प्रभाव?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद RSS की भूमिका क्या होगी?
संघ से जुड़े लोगों का मानना है कि अब राज्य में डर का माहौल कम होगा और ज्यादा लोग खुलकर संगठन से जुड़ेंगे.
वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि RSS सिर्फ सरकार पर निर्भर संगठन नहीं है.
चाहे बीजेपी सत्ता में हो या विपक्ष में, संघ अपनी वैचारिक और सामाजिक गतिविधियां लगातार जारी रखता है.
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RSS: निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति सिर्फ बड़े भाषणों और रैलियों से नहीं चलती.
जमीनी संगठन, वैचारिक नेटवर्क और लगातार सामाजिक संपर्क भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.
बीजेपी की जीत में RSS की भूमिका कितनी निर्णायक थी, इस पर बहस आगे भी जारी रहेगी. लेकिन इतना जरूर है कि बंगाल के नतीजों ने यह दिखा दिया कि जब संगठन और विचारधारा लंबे समय तक जमीन पर काम करते हैं तो उसका असर चुनावी राजनीति में दिखाई देता है.
अब सबकी नजर इस बात पर है कि आने वाले वर्षों में बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी और RSS का प्रभाव कितना बढ़ेगा.













