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हिन्दू आस्थावान भय कब तजेंगे ? hindoo aasthaavaan bhay kab tajenge ?

©के. विक्रम राव, नई दिल्ली 

–लेखक इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।


 

ऊपर का अखबारी शीर्षक पढ़े (अमर उजाला: 24 अगस्त 2022: पृष्ठ 10: कालम 2 से 4)। एक सेक्युलर गणराज्य के चिंतनशील नागरिक के नाते आपकी क्या राय है ?

 

ज्ञानवापी शिवालय (मस्जिद) किसका है? इस बिन्दु पर वाराणसी की जिला अदालत में हुयी बहस के दौरान इस्लामी पक्षधर ने कहा कि यह वक्फ संपत्ति है। मुगल बादशाह मोहिउद्दीन औरंगजेब आलमगीर ने इसे वक्फ को दान दिया था। यदि यह भूभाग औरंगजेब का तब (1659-1907) का था तो अब वह किसके अधिकार में होगा?

 

स्पष्ट है कि भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री (काशी से भाजपायी सांसद) नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की सरकार का। (26 मई 2014 से) उन्हीं का राज है। उनके राज में मोदी ने ही बाबरी ढांचे को रामजन्मभूमि बनाकर हिन्दुओं को दिया। काशी में भी ऐसा ही किया। फिर काशी और मथुरा में भी वैसा ही कानून क्यों नहीं ? लॉ आफ कॉनक्वेस्ट (विजेता की विधि) इसे मान्यता देता है।

 

क्योंकि अचल संपत्ति शासक की होती है। औरंगजेब के बाप-दादों से हथियाकर मिली थी। हालांकि मुस्लिम पक्षधर काशी कोर्ट में कोई विश्वनीय दस्तावेज जमा नहीं कर पाये।

 

हिंदू पक्ष के एडवोकेट विष्णु शंकर जैन का कहना है कि मुस्लिम पक्ष जवाबी बहस में अपनी ही दलीलों में फंस चुका है। उन्होंने कोर्ट में कागजात पेश कर बताया है कि ‘‘ज्ञानवापी की संपत्ति वक्फ नंबर 100 के तौर पर दर्ज है, यह एक बहुत बड़ा फ्रॉड है। उन्होंने ज्ञानवापी से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित आलमगीर मस्जिद के कागजात पेश किए हैं।‘‘

 

वह मस्जिद ‘‘बिंदु माधव मंदिर‘‘ को तोड़ कर बनाई गई थी। सभी जानते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद का नाम आलमगीर मस्जिद नहीं है। अब वह ज्ञानवापी मस्जिद को आलमगीर मस्जिद बता रहे हैं। औरंगजेब ने यदि ज्ञानवापी मस्जिद की संपत्ति का वक्फ किया था तो वह डीड लाकर जज को दिखाई जाए, लेकिन मस्जिद कमेटी नहीं दिखा पाई।

 

आधुनिक कानून का एक अन्य पहलू भी है। उसे लॉ आफ कॉनक्वेस्ट कहा जाता है। अर्थात इतिहास में जिसकी जीत दर्ज हुयी, कानून वही रचता है। खुद मुस्लिम पक्षधर ने इसे माना। तो शासक औरंगजेब से अब वक्फ बोर्ड से क्या ताल्लुक ?

 

लेकिन मसला यहां यही है कि ज्ञानवापी अजन्मे भोले शंकर की है न कि केवल तेरह सौ वर्ष पूर्व अवतरित हुये इस्लामियों की। भारत कभी ईसाई, फिर मुस्लिम-बहुल तुर्की जैसा नहीं हुआ था। इस्तांबुल में पहले हाजिया सोफिया चर्च था। अतातुर्क ने उसे सेक्युलर म्यूजियम बनाया। अब इस्लामिस्टों ने फिर मस्जिद बना दिया।

 

अर्थात शासन का रूप बदलते ही हाजिया सोफिया भी बदल गया। ज्ञानवापी पर भी यही नियम लागू होता है।

 

इसी संदर्भ में स्वतंत्रता की कगार पर खड़े (1947) भारत में अंग्रेज शासकों ने ब्रिटेन लौटने की बेला पर पूछा था कि ‘‘वे आजाद हिन्दुस्तान किस सत्ता को सौंपे ?‘‘ तो मोहम्मद अली जिन्ना का वकीलनुमा जवाब था: ‘‘आपने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से सत्ता छीनी। अतः भारतीय मुसलमानों को सौंपिये।‘‘ इस पर सरदार पटेल का प्रत्युत्तर सटीक था। वे बोले: ‘‘बहादुर शाह मराठों का पेंशनर था। अतः मराठों को दीजिये। तब अपने घर की ओर प्रस्थान कीजिये।‘‘

 

अर्थात औरंगजेब के काल से शासन और राज का आकार परिवर्तनशील रहा। इसके अतिरिक्त कोई अनिवार्यता नहीं है कि वर्तमान भारत सरकार और न्यायालय आयातीत जालिम बादशाह औरंगजेब की घोषणाओं, कानूनों और रिवाजों को पालन करने पर बाध्य है। स्वाधीन गणराज्य के अपने नियम और दस्तूर होते हैं। औरंगजेब सत्तामद में चूर शासक था, जो हिन्दू बहुमत का अपमान कर क्रूर इस्लामी राज चला रहा था।

 

कैसा पारिवारिक आदर्श था उस शासक का ? पिता को जेल में कैद कर दिया। कंस की भांति। अपने तीन सगे भाईयों का कत्ल कर दिया ताकि सिंहासन वह कब्जिया ले। अयोध्या में कहां तीसरे भाई भरत ने चौदह साल खड़ाऊ लेकर जंगल में झोपड़ी में वक्त काट दिया। राजपाट छोड़ दिया। कहां शाहजहां का तीसरा बेटा औरंगजेब ने बड़े भाई को हाथी के पैरों तले कुचलवाया। कटा सर नाश्ते की तश्तरी में वृद्ध बंदी बाप को भेजा। कैसा तुलनात्मक माजरा है ?

 

क्या कोई भी आत्मगौरव वाला भारतीय इस कट्टर सुन्नी बादशाह का नाम लेना भी गवारा करेगा ? न्यायप्रिय राष्ट्रों में तो कतई नहीं। बहुमतावलम्बियों पर जजिया लगाना। उनके आस्थास्थलों को तोड़ना, पूजनीय मूर्तियों को मस्जिद की सीढ़ी पर जड़ना, काशी विश्वनाथ और मथुरा के कृष्ण जन्मस्थल, काठियावाड का सोमनाथ आदि पर हमला करना। वाराणसी, थट्टा और मुलतान में पाठशालाओं को बंद करना, तलवार के बल पर कलमा पढ़वाना।

 

हिन्दुओं द्वारा पालकी, घोड़े और हाथी की सवारी पर पाबंदी। होली, दिवाली के मनाने पर मनाही। यमुना, सरस्वती, गंगा तट पर शवदहन बंद करवाना। सिख गुरूओं के सरों को जमीन में गड़वाना। सतनामी, राजपूत, जाट, मराठों का संहार। सबसे क्रूरतम था विप्रों को गोमांस खिलाना। यह सब जघन्य कृत्य करने वाले को कोई भी आस्थावान कभी माफ करेगा ?

 

औरंगजेब ने मजहब को सल्तनत के ऊपर थोपा। तो क्या काशी का जिला कोर्ट जब ऐसे ऐतिहासिक अपराधी के पक्ष में दिया गया कोई प्रमाण स्वीकारने में बाध्य है? औरंगजेब खुदा का बंदा नहीं। शैतान की प्रतिमूर्ति था। उसे मिटना होगा। जैसे उसके नाम की सड़कें मिटीं हैं। अपने गौरव की रक्षा का मसला है राष्ट्र के समक्ष।

 

 

When will Hindu believers overcome fear?

 

 

K Vikram Rao

 

 

Read the headline above (Amar Ujala: 24 August 2022: Page 10: Columns 2 to 4). What is your opinion as a reflective citizen of a secular republic?

 

Gyanvapi pagoda (mosque) belongs to whom? During the debate on this point in the district court of Varanasi, the Islamic advocate said that it is a Waqf property. Mughal emperor Mohiuddin Aurangzeb Alamgir donated it to the Waqf. If this land belonged to Aurangzeb then (1659-1907), then in whose possession will it be now?

 

It is clear that the government of the elected Prime Minister of India (BJP MP from Kashi) Narendra Damodardas Modi. (from 26 May 2014) is his rule. Under his rule, it was Modi who made the Babri structure as Ram Janmabhoomi and gave it to the Hindus. He did the same in Kashi. Then why is there no similar law in Kashi and Mathura? The Law of Conquest recognizes this.

 

Because immovable property belongs to the ruler. Got it by grabbing it from Aurangzeb’s forefathers. However, the Muslim parties could not submit any credible documents in the Kashi court.

 

Advocate Vishnu Shankar Jain of the Hindu side says that the Muslim side is caught in its own arguments in the counter-argument. He has presented papers in the court and said that “Gyanvapi’s property is registered as Waqf number 100, this is a big fraud. He has presented the papers of Alamgir Masjid, located about two kilometers from Gyanvapi.

 

That mosque was built by demolishing the “Bindu Madhav Mandir”. Everyone knows that the name of Gyanvapi Masjid is not Alamgir Masjid. Now he is telling Gyanvapi Masjid as Alamgir Masjid. If Aurangzeb had done waqf of the property of Gyanvapi Masjid, then it should be shown to the judge by bringing a deed, but the mosque committee could not show it.

 

There is another aspect of modern law as well. It is called the Law of Conquest. That is, the one whose victory is recorded in history, the law is created by him. The Muslim supporters themselves accepted this. So what is the relation with the Waqf Board now with the ruler Aurangzeb?

 

But the issue here is that the knowledge-vapi belongs to the unborn innocent Shankar and not only to the Islamists who appeared thirteen hundred years ago. India was never like a Christian, then Muslim-majority Turkey. Hajiya Sophia was the first church in Istanbul. Ataturk made it a secular museum. Now Islamists again built a mosque.

 

That is, as soon as the form of governance changed, Hajiya Sophia also changed. The same rule applies to Gyanvapi as well.

 

It was in this context that the British rulers in India, standing on the verge of independence (1947), on the time of their return to Britain, asked, “To which power they should hand over independent India?” So Mohammad Ali Jinnah’s lawyer was the answer: “You have given the last Mughal He snatched power from Emperor Bahadur Shah Zafar. So hand it over to the Indian Muslims.” Sardar Patel’s response to this was accurate. He said: “Bahadur Shah was a pensioner of the Marathas. So give it to the Marathas. Then go to your home.”

 

That is, from the time of Aurangzeb, the size of the rule and the kingdom remained variable. Apart from this, there is no compulsion that the present Government of India and the court is bound to follow the proclamations, laws and customs of the imported bloodthirsty emperor Aurangzeb. An independent republic has its own rules and customs. Aurangzeb was a powerful ruler in power, who was running a cruel Islamic rule by insulting the Hindu majority.

 

What was the family ideal of that ruler? Father imprisoned in jail. Like Kansa. Killed his three real brothers so that he could take the throne. Where in Ayodhya, the third brother Bharata spent fourteen years in a hut in the forest with a khatau. left the kingdom. Where Shah Jahan’s third son Aurangzeb crushed the elder brother under the feet of an elephant. The chopped head sent the old prisoner to the father in a saucer of breakfast. What is the comparison?

 

Would any self-respecting Indian even dare to take the name of this staunch Sunni emperor? Absolutely not in just nations. Imposing Jizya on the majority. Destroying their places of worship, erecting revered idols on the steps of the mosque, attacking Kashi Vishwanath and Krishna birthplaces of Mathura, Somnath in Kathiawad etc. Closing the schools in Varanasi, Thatta and Multan, getting Kalma to be recited on the strength of the sword.

 

Restrictions on the riding of palanquins, horses and elephants by Hindus. Prohibition on celebrating Holi, Diwali. To stop cremation on the banks of Yamuna, Saraswati, Ganga. Burying the heads of Sikh Gurus in the ground. Destruction of Satnami, Rajput, Jats, Marathas. The worst was the feeding of beef to the Vipras. Will any believer ever forgive the person who did all this heinous act?

 

Aurangzeb imposed religion on the Sultanate. So is the District Court of Kashi when it is bound to accept any evidence given in favor of such a historical criminal? Aurangzeb is not a servant of God. He was the image of Satan. He will have to perish. As the roads named after him have been erased. The issue of protecting our pride is before the nation.

 

 

पानी की मटकी paanee kee matakee

 

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