बेच रहा ईमान को | newsforum

©सरस्वती साहू, बिलासपुर, छत्तीसगढ़  


बेच रहा ईमान को, देख आज इंसान

प्रगति करता हूँ कहे, संग लगता अपमान

अधम गति को जा रहा, निज पथ कर पहचान

मोल भाव करता रहा, बेच गुणों की खान

मर्यादा को लांघ कर, सुखी नहीं संसार

हित परहित को सोचकर, जीवन करो निसार

दुख न आये जीवन में, जन-जन रहा अचेत

कांटा पग पर जब गड़े, होता मनुज सचेत

सदाचार रह पायेगा, जब रखोगे ध्यान

करे भला तो हो भला, बेचो मत ईमान


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