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कुछ औरतें नहीं चाहती बेटी जनना | ऑनलाइन बुलेटिन

©प्रीति विश्वकर्मा, ‘वर्तिका’

परिचय- प्रयागराज, उत्तर प्रदेश.


 

 

 

कुछ औरतें नहीं चाहती बेटी जनना,,

कहीं उसके भी सपने अधूरे ना रह जाये।

पंख देकर फ़िर उड़ने ही ना दिया जाये,,,

कहीं वो भी ना अपना ले कोरे सपने, ,

जिसमें फ़िर रंग ही ना भरने दिया जाये. .

कुछ औरतें नहीं चाहती बेटी जनना,

कहीं उसकी उम्मीद नाउम्मीद ना हो जाये ।

 

 

कहीं उड़ने के लिये आसमाँ तो मिले,

लेकिन पतंग सा,

उसे उड़ने की पूरी आज़ादी हो

लेकिन किसी और के हाथ में थमी डोरी,,,

हर पल उसे अपनी हद याद दिलाती हो

सृष्टि जिसकी ऋणी हो फ़िर भी,,,

दुनिया में कुछ गालियाँ उससे relate की जाती हो

कुछ औरतें नहीं चाहती बेटी जनना,

कहीं जहाँ उसकी कद्र ही ना की जाती हो ।

 

 

कहीं उसकी बच्ची के संस्कारॊं को,

उसके पहनावे से ना आंका जाये

कहीं रात को जब बच्ची बाहर हो,

तो उसका जी किसी अनहोनी से ना घबराये

कुछ औरतें नहीं चाहती बेटी जनना

कहीं उसके सपने भी टूटकर ना बिखर जाये।

 

कहीं नोच ना खायॆ दरिन्दे और,,,,

ये पाप उसके कपड़ों के साइज के आड़ में छिपाया जाये,,

दिल घबराता रहता माँ का, जब तक वो घर आ ना जाये

दिल घबरा जाता है उसका, कहीं उसकी बच्ची,,,,

आज़ाद देश की गलियों में कहीं कैद ना हो जाये

नहीं जनना चाहती कुछ औरतें बेटी,,

खुले आसमान में, नन्ही चिड़िया का आसमाँ, कहीं खो ना जाये ।

 

 

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